सुनो, अमृता।
आज 21वीं सदी के हमारे इस पुराणपंथी देश में
बहुत मुश्किल है तुम-सा हो पाना,
मतलब, अमृता , हो पाना।
हाँ-हाँ, मालूम है, बिना सर उठाए भी मुझे
कि उठ चुकी हैं कई आँखें मुझ पर
और तन गयी हैं भौवें कई।
पता है मुझे कि करने जा रही हूँ
कुछ बातें ऐसी जो शायद न लगें माकूल।
पर अमृता, कहूँगी मैं सच ही ।
आज भी देखो न, बदला कहाँ हैं हमारा समाज, और
कहाँ बदली हैं उसकी रवायतें ?
सींकचों और रिवाज़ों में अब भी छटपटाती
है वह स्त्री जो समाज के लिए
है बस एक देह और
जिसकी आत्मा के अस्तित्व को ही
दिया गया है नकार।
कि उसकी इच्छाएँ समझने की नहीं है किसी को
भी दरकार।
पर जाने क्यों किन्हीं बेबात की बात पर यूं बरबस -ही
चुपके से आती है तुम्हारी याद और
एक उफनता -सा मन
ढूँढता है इन सियाह रातों में भी
तुम्हारे उस धधकते व्यक्तित्व
की लौ को, जिसमें भरा था
अटूट जज़्बा, क्योंकि तुमने दिया था
तरजीह सबसे पहले अपने अंदर बसी
स्त्री की उस रूह को।
उस आदम ज़ात को जो थी
पत्नी, माँ, इन सब भूमिकाओं से पहले, बहुत पहले।
तुमने ही तो दिया था प्रेम को
पहले-पहल एक ऐसी परिभाषा
जिसमें देह की कोई आवश्यकता न थी,
और चाहा था साहिर को नहीं
बल्कि उसके एहसास को, और वह भी
भरपूर और ताउम्र।
और सच कहूँ तो ,
उन्मुक्तता और स्वच्छंदता जैसे
शब्द भी तो जँचते थे बस तुम्हारे ही इस लाड़ पर।
पर उसमें कहूँगी मैं, कि थी तुम दोनों की ही भागीदारी,
वरना आज की अमृताओं को
कहाँ मिलते हैं तुम्हारे-से “साहिर” भी आज,
मानती हो न कि, संवेदनाओं का है गहरा अकाल ?
पर वाकई कुछ तो बात है तुम्हारी कि,
हर बंधनों और नियमों की दहलीज़ से
परे हटकर भी, तुमने ही निभाए रिश्तों के सच्चे अर्थ।
वरना आज की दुनियावी पीढ़ी के
कहाँ टिकते हैं,
जैसे तुमने निभाई मरते दम तक
इमरोज़ के साथ।
साथ रहने के लिए कहाँ ली तुमने विवाह जैसी कोई बैसाखी,
और न ही रखे कोई करवाचौथ, तीज इत्यादि।
पर वाकई अमृता, कुछ तो बात है तुम्हारी
कि इन चोंचलों के बगैर तुम हीं तो थीं
इमरोज़ की पूरी चित्रकारी।
साहसी, बेपरवाह सरीखा कोई तुम-सा, कहाँ हो पाता है आज
जो संवेदनाओं के खरेपन के लिए
उठा ले खतरे और
स्वीकार करे परिणाम।
पर तभी शायद भर गयी थी एक आंच-सी लेखनी में तुम्हारी
समझा था कहीं गहरे में,
मानवीय चेतनाओं के संबंध और
उड़ेल दिया था पन्नों पर बेहिसाब और
उन्हीं सच्ची संवेदनाओं से ही रच बस कर
अमर हो गयी कोई ‘पूरो’ कभी, तो कभी
खुद तुम्हारे ‘वारिस शाह‘।
पर वाकई अमृता, एक तुम ही थीं
प्रेम से सरोबार जीवन की धड़कती तस्वीर
और तभी तो सोचती हूँ कि, कहाँ बनती हैं अमृतायें आज !






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