• चाँद से बातें……

    घने बादलों के भीतर यूं घटते-बढ़ते  लुक छिप चलते  मुझको ढूंढ लेते हो तुम  चाँद मेरे मन के आकाश में हर रोज़ निकलते हो तुम।  तुम्हें करनी होती हैं मुझसे कितनी बातें  दिन-भर के हाल  देश-दुनियाँ बेहाल   मौन रह कर तुम केवल संकेतों से करते सवाल।  मुझे भी तो रहते…

    Continue reading →: चाँद से बातें……
  • राग मल्हार

    बरसात की रातों की होती है अपनी नीरवता, एक अंतर्निहित राग, अपना निजी संगीत। झमाझम बरसते मेघ के सुर में, घुलती हुई प्रकृति। शाम पड़े झींगुरों की लगातार बजती बाँसुरी, बरसाती पानी से लबलबाये गड्ढों, से बजती मोटे-मोटे मेढकों की डफली, बूंदों की टप-टप जो कभी झीसी की आवाज़ में…

    Continue reading →: राग मल्हार
  • भीड़

    भीड़

    1 भीड़ व्यक्तियों का भी है, बातों का भी। जिस तरह क्षणों से मिल कर एक युग और लहरों से मिल एक नदी बनती है उसी तरह, लोगों से एक भीड़ बनती है। 2 भीड़ की आँखें नहीं होतीं, और न होता है महसूस करने को हृदय। होता है तो…

    Continue reading →: भीड़
  • धूप-सफर

    धूप-सफर

    बोझिल और मद्धिम हवा, कुछ थकी-सी अलसाई, खिड़की की काँच से दिखती , पत्तियों से छन-छन कर गिरती कतरा-कतरा धूप ।                             मन भी अबूझ ख्यालों में डूबा, तिरता,                              देखता पारदर्शी काँच के आर- पार                              पत्तियों के बीच से फिर- फिर झांक जाती धूप                              धीरे- धीरे मानो…

    Continue reading →: धूप-सफर
  • उलझनें

    उलझनें

    उलझनें तमाम उम्र की बस उस एक पल में सुलझती लगती हैं, जब महज़ ख्याल तुम्हारा वजूद में आता है। हाँ , गुज़रे हैं बरस कई, चंद लम्हों के इंतज़ार में बीत गए हैं क्षण अनगिनत, एक तुम्हारे खुमार में। पर ऐसा गुमान होता है मानो बरसों और क्षणों ने…

    Continue reading →: उलझनें

Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

Let’s connect

Design a site like this with WordPress.com
Get started