• किताबों में फूल…

    किताबों में चुपके-से दबा रक्खा समय के दबाव से कुछ सघन कुछ सख़्त-सा हो गया वो सूखा गुलाब, अब कहाँ मिला करता है। जिस जगह फूल को पन्नों ने अपने छूने से दबाया था वहीं ऐन जगह कैसे छोड़ देता फूल अपना निशान अपना रंग जो अब पन्नों पर उगा…

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  • चाँद से बातें……

    घने बादलों के भीतर यूं घटते-बढ़ते  लुक छिप चलते  मुझको ढूंढ लेते हो तुम  चाँद मेरे मन के आकाश में हर रोज़ निकलते हो तुम।  तुम्हें करनी होती हैं मुझसे कितनी बातें  दिन-भर के हाल  देश-दुनियाँ बेहाल   मौन रह कर तुम केवल संकेतों से करते सवाल।  मुझे भी तो रहते…

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  • राग मल्हार

    बरसात की रातों की होती है अपनी नीरवता, एक अंतर्निहित राग, अपना निजी संगीत। झमाझम बरसते मेघ के सुर में, घुलती हुई प्रकृति। शाम पड़े झींगुरों की लगातार बजती बाँसुरी, बरसाती पानी से लबलबाये गड्ढों, से बजती मोटे-मोटे मेढकों की डफली, बूंदों की टप-टप जो कभी झीसी की आवाज़ में…

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  • भीड़

    भीड़

    1 भीड़ व्यक्तियों का भी है, बातों का भी। जिस तरह क्षणों से मिल कर एक युग और लहरों से मिल एक नदी बनती है उसी तरह, लोगों से एक भीड़ बनती है। 2 भीड़ की आँखें नहीं होतीं, और न होता है महसूस करने को हृदय। होता है तो…

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  • धूप-सफर

    धूप-सफर

    बोझिल और मद्धिम हवा, कुछ थकी-सी अलसाई, खिड़की की काँच से दिखती , पत्तियों से छन-छन कर गिरती कतरा-कतरा धूप ।                             मन भी अबूझ ख्यालों में डूबा, तिरता,                              देखता पारदर्शी काँच के आर- पार                              पत्तियों के बीच से फिर- फिर झांक जाती धूप                              धीरे- धीरे मानो…

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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