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    ज़िंदगी

    ज़िंदगी

    तुझे कितना जाना है हमने ज़िंदगी। समय की छलनी से चाले हुए लम्हों की कड़ियाँ-ही-कड़ियाँ। वो मिलना बिछड़ना वो गिरना संभलना। वो सावन की बारिश में घुलना पिघलना वो जेठ की दुपहरी में तपना मचलना । वो पतझड़ की शामों की पीली उदासी। ठिठुरते हुए रातों की वो लंबी उबासीं।…

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  • प्रतीक्षा….

    अब जबकि मुझे यक़ीन हो चला है कि वो जो तुमने कुछ अरसा पहले कहा था वह आखिरी हर्फ़ था हमारे बीच। जाने क्यूँ दिल को सुकून-सा आ गया है। यह इत्मीनान हो चला है कि अब न गुज़रेंगी इंतज़ार में घड़ियाँ न होगी प्रतीक्षा उस समय की जिसका दिल…

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  • तुम…

    तुम…

    मेरी तन्हाइयों में जो गूँजता है हर पल, वो कोई अधूरा-सा राग हो तुम। मेरी ख़ामोश आँखें जो पढ़ती हैं पल-पल, एक वो कोरा-सा किताब हो तुम।। हवाओं ने आकर शिकायत-सी की है, तुम्हें ढूंढ लाऊं ये मिन्नत भी की है, नदी, रेत, पर्वत, समंदर, घटाएँ, कहाँ-से-कहाँ तक मैं फेरूँ…

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  • किताबों में फूल…

    किताबों में चुपके-से दबा रक्खा समय के दबाव से कुछ सघन कुछ सख़्त-सा हो गया वो सूखा गुलाब, अब कहाँ मिला करता है। जिस जगह फूल को पन्नों ने अपने छूने से दबाया था वहीं ऐन जगह कैसे छोड़ देता फूल अपना निशान अपना रंग जो अब पन्नों पर उगा…

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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