• गुज़रे सालों की किरचें सम्भाले यूँ ही अचानक एक दिन मिल जाऊँगी तुमसे नये साल में । थोड़ी उम्मीद थोड़ी परेशानी लिए अपने हालात की कुछ बदगुमानियाँ भरे युगों से झेली हुई वीरानियाँ साँसों में गुज़री इंतज़ार की घड़ियाँ थोड़े बेहतर जी लेने की संभावनायें सब कुछ अपनी आँखों में…

    Continue reading →: लिफ़ाफ़ा….
  • हम ख़ामोश लोग, चुपचाप लोग, जिनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता या शायद कहने को बहुत कुछ बस उन्हें ध्वनियों की शक्ल में बाहर निकालने का जज़्बा नहीं होता, उन्हें प्रायः कमतर मान लिया जाता है बेज़ुबान अदना करार दिया जाता है। वो जिन्हें नहीं आता अपनी कामयाबियों…

    Continue reading →: ख़ामोश लोग
  • ,

    रक्षा…

    रक्षा…

    तुम्हें संभाल रखा है मैंने कहीं गहरे भीतर अपने। पहुंचाती हूँ वहाँ बस, चाँद की दूधिया रोशनी, सुबह घास से उठा कर लाए टटके हरसिंगार की पावन गंध ,नन्हें सूरज की उजली किरणें और पत्तों पर से सरसरा कर गिर जाने वाली ओस की बूंदें। बचाना चाहती हूँ तुम्हें हर…

    Continue reading →: रक्षा…
  • चाँद तुम नभ में ही रहना…..

    देखा था मैंने स्वप्न कि रात्रि,के नभ में तुम ज्यों चंद्र की निर्मल धारा हो।शीतल किरणों -सी तरुणाईपूर्ण स्वरूप न भी तो क्याहै अपूर्णता में भी तुम्हारी सुघराई।  तुम थे कोई उज्ज्वल देव-काया, ज्योत्सना की फैली घनी छाया। पक्षों के घटने-बढ़ने से भीजिसकी न मलिन होती आभा।  रात्रि के गहन अंधियारे कोतुम थे…

    Continue reading →: चाँद तुम नभ में ही रहना…..
  • आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र

    ढलती हुई शाम , आती हुई रात से घुलती हुई चलाती है , कुछ छूटता , कुछ फिसलता-सा एक सिलसिला। अँधेरों में धीरे-धीरे घिरता आकाश, मानो चल रहा हो गहरा , बोझिल , सन्न-सा वार्तालाप। पक्षियों की पांतें बसेरों की ओर लौटती, किसी मज़ार पर जलते हुए लोबान से महकती…

    Continue reading →: आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र

Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

Let’s connect

Design a site like this with WordPress.com
Get started