• वसीयत…

    वसीयत…

    जब कभी सफ़ेद बादलों के बीच गुज़रते प्लेन से नीचे झाँकती हूँ, तो मुझे अपनी वसीयत कर जाने का मन होता है। डरती हूँ कि जो इन बादलों की तरह ऊपर ही रह गयी, जो अबकी ज़मीन का मुंह न देख सकी तो मेरी मिलकियतों का क्या होगा? यूं तो…

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  • बारिश..

    बारिश..

    नहीं देती ज़िंदगी वजहें तुमसे मिलने की   कोई ऐसा सिरा भी मेरे हाथों में नहीं थमाती कि  उससे बंधे बंधे तुम से आ मिलूं  जीवन की रंगीन परछाइयाँ सी भी तो तुम्हारी   कभी भूले से मुझ पर नहीं पड़ती  कि ठंडी छाया में जिसकी बैठ  चंद घड़ी इत्मीनान…

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  • आँखें…

    आँखें…

    दूसरों की आँखों में जाने क्या तलाशती है ये आँखें, क्या है जिसे सुनना चाहते हैं ये कान वो शै जिसे महसूस करना चाहती है ये रूह। अपनी और झांकने वाली आँखों में शायद कोई पुरानी गर्माहट-सी अपनाइयत ,आवाज़ में वो फुसफुसाहट सी निश्चिंतता, बिना किसी ग़ैरज़रूरी जोश से भरी,…

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  • साँझ…..

    साँझ…..

    यह साँझ सुनहरा ओढ़े तुम, किरणों में लिपटी आना  यूँ पत्तों में लुकते छिपते, रात ज़रा थम के आना।   सूरज के ढलने की बेला, जब धरती गगन से मिलती है  उस क्षितिज को आँखों में मेरी, कुछ पल को तुम ठहराना।   आसमान ने ठीक इसी क्षण, धूसर चादर तानी है…

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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