• शोक-सभा

    एक अलसाई हुई दोपहरी में , शांत आँगन से अचानक आई कोई आवाज़। दबे पाँव जाकर देखा तो पाया कि खाली पड़ी कुर्सियों में बैठे हुए हैं कई शब्द, कुछ आगे की ज़मीन पर लुढ़के हुए से शब्द। कई प्रकार के शब्द। कोई लच्छेदार बनावट वाला शब्द तो कोई घुमावदार…

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  • एक दिन, हाँ ,शायद, था वह इतवार, जब खोला था हाथों ने अधखुली आँखों से अख़बार, और पाया था खुद को ख़बरों से बेबस और लाचार । खबर थी कि काट दिये गए थे कहीं घने जंगल तो , कहीं शुरू हो गयी थी बेतहाशा ‘बुशफ़ायर’। पिघलने लगीं थीं बर्फ…

    Continue reading →: थम गयी रफ़्तार!
  • आज जब यूं ही साहिर लुधियानवी की नज़्मों को पढ़ रही थी तो उनकी लिखी एक खूबसूरत नज़्म सामने आ गयी- “किसी को उदास देखकर”। पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो फ़ैज़- अहमद- फ़ैज़ जो भाव अपनी मशहूर नज़्म “मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग ” में उठाते हैं…

    Continue reading →: साहिर और फ़ैज़…
  • कम ही होता है जब होते हैं अपने साथ, कुछ कोहरे, कुछ चीड़ और खामोश पहाड़ों का साथ, एक लंबी खामोशी और हवाओं का भी शोर नहीं। कम ही होता है , जब झाँकती है सिंदूरी धूप ठीक पहाड़ों के पीछे से, और आती है दूर कहीं किसी पहाड़ी नदी…

    Continue reading →: शाम के धुंधलके में चीड़
  • साहित्य की परिकल्पना मनुष्य ने अपनी आदिम अवस्था में ही तय कर ली थी, हालांकि उसका स्वरूप लिखित न होकर मौखिक, चित्रित और पूर्णतः असम्बद्ध था। भीमबेटका के भित्तिचित्रों में उत्सव मनाते और शिकार करते आदि मनुष्यों के चित्रों ने एक आदिम कहानी को ही तो गुफा के निर्जीव पत्थरों…

    Continue reading →: साहित्य और समाज की भिन्नता और अंतर्संबंध

Dear Readers

“सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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