जब अपने साथ होता हूँ, तो
तुम मेरे पास आते हो।
तुम्हें भूला सा रहता हूँ, बचाकर
यूँ नज़रें तुमसे मैं
भटका सा कुछ फिरता हूँ।
गुज़रते रात के चुप अंधेरों में, मगर
बिजली बन तुम कौंध जाते हो।
तुम्हें सोचों में ना ला सकूँ, परे सरका के
यादों को, मैं हर पल खुद को उलझा लूँ ,
मगर नाकाम कोशिशों का हश्र, कि
तुम मुझ तक आ ही जाते हो।
दिनों की उलझनें सारी, महीनों की ये दुश्वारी,
कभी जिनसे निजात पाता हूँ,
खड़ा चुपचाप तुमको मैं , अपने पास पाता हूँ।
न जाने कितने रातों की जगी आखें
कभी भटके से जो कुछ पल को ज़रा
आराम पाती हैं, वहाँ भी ख़्वाबों के
लिहाफ़ सरका तुम
बरबस आ ही जाते हो।
कोई तो पल मुझे मिलता, जहां तुम
न सुनायी दो, कोई तो शख़्स
वो मिलता जिसमें, तुम न दिखायी दो।
हर एक में ढूँढता रहता तुम्हारा
ही तो मैं चेहरा, चाहूँ करे
मुझसे कोई बातें तुम्हारी सी,
कोई तो मिल सके जो हो,
मुझे तुम्हारी ही तरह तकता।
किन्हीं गुमनाम राहों में कभी चाहूँ,
मैं तुमसे यों भी टकरा जाना,
किसी परछाई के पीछे कभी बस भागते जाना
उसे तुमसा न पा कर फिर,
खुद पर ही खीझ-सा जाना।
दिलासा सा मैं खुद कभी, अपने को देता हूँ,
भीड़ों के छलावे में खोया ही तो रहता हूँ,
मगर वीरान हिस्से में मन के, तुम
अक्सर गुनगुनाते हो।
मैं खुद से कहता रहता हूँ, तसल्ली बेवजह ही सही
कि मुझे तुम याद ही कहाँ
कि अब तुम याद ही कहाँ,
मेरा मन इस झूठ को सुन कर
कहकहे ख़ूब लगाता है।






Leave a comment