कुछ नज़्म हमारे रूह की गहराइयों में जा बसते हैं। मानो अपने भीतर की ही कोई उदासी किसी फ़नकार ने शब्दों के मार्फत पन्नों में उड़ेल दिया हो। वो जिसे हम तो कोई नाम, कोई रूप नहीं दे सकते, पर किसी शायर ने उसे ठीक उन्हीं शब्दों में बयान कर दिया हो। कला की खूबसूरती और उसका मायना ही इस एक बात से है कि वो किसी एक द्वारा लिखी जा कर भी सबकी अनुभूति का, सबकी संवेदनाओं का हिस्सा बन जाती है। उर्दू अदब के अज़ीम शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मक़बूल नज़्म “मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न मांग” भी अपने पाठकों और एक बेहद प्रसिद्ध ग़ज़ल के रूप में अपने सुनने वालों को, एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जिसके हर लफ़्ज़ से एक संवेदनशील हृदय अपने सरोकार जोड़ सकता है। मैडम नूरजहां ने अपनी आवाज़ में इस नज़्म को मशहूर किया और उसके बाद से यह नज़्म जैसा कि स्वयं फ़ैज़ कहते थे “उनकी नहीं रही”, वह लोगों की हो गईं। दक्षिण एशिया की सांगीतिक विरासत में शायद ही कोई पीढ़ी बीती होगी जिसने इस नज़्म को अपनी गायकी में न ढाला हो। पर इस लेख में हम इसकी गायकी के अंदाज़ों से अधिक इस नज़्म के ऐतिहासिक महत्त्व पर बात करेंगे। इसे लिखने वाले की नज़रों से इस नज़्म को पढ़ते हुए कुछ जरूरी सवाल भी उठायेंगे और शायद उस पीछे छूट गई महबूब के लिए भी अपनी चिंताएँ ज़ाहिर करेंगे।
1911 में सियालकोट (तत्कालीन पंजाब, अब पाकिस्तान में) में जन्मे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ प्रगतिवादी कवियों के उठान के सबसे उल्लेखनीय नाम हैं। पंजाब की धरती जो प्रतिरोध और क्रांति के लिए जानी जाती है, उस की संवेदनशीलता से पगे हुए फ़ैज़ उस लंबी शृंखला की अगली कड़ी थी जिसकी शुरुआत अल्लामा इक़बाल से होती थी और जिसकी ही आगे की धारा साहिर लुधियानवी के नज़्मों में अपनी एक विरासत बनाती आई थी। फ़ैज़ के काव्य की उर्वरता उनके प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व के रंगों को समेटे हुए है जहां वह फ़ारसी के शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र की पारंपरिकता को प्रगतिशीलता के आधुनिक मानदंडों के साथ संतुलित करते हैं। व्यक्ति की निज पीड़ा को एक सामाजिक-राजनीतिक मुक्ति के साथ और रूमानियत को क्रांति के साथ मिलाते हुए फ़ैज़ उर्दू अदब और विशेषकर उर्दू शायरी को उस शीर्ष पर ले जाते हैं जो उसे अभूतपूर्व बनाती है।आगे आने वाले शायरों की पीढ़ी ने मानो फ़ैज़ को अपने अवचेतन में सीधे-सीधे ग्रहण किया है क्योंकि फ़ैज़ ने अपने काव्य से कविता के संसार के लिए इतनी सारी संभावनाएँ खोल दीं कि उसके ही प्रभाव हमें हर किसी में दिखलाई पड़ते हैं।
मुझसे पहली सी मोहब्बत फ़ैज़ के कुछ सबसे प्रसिद्ध नज़्मों में से एक है जिसे उन्होंने तब लिखा था, जब वह सिंध सेंट्रल जेल में बंद थे। उनके सबसे पहले कविता संग्रह नक़्श-ए-फ़रियादी में सम्मिलित इस नज़्म ने एक संवेदनशील कवि की संवेदनाओं को अपनी अभिव्यक्ति के दूसरे अर्थ दिए जहां उसने अपने समय और समाज की जटिल वास्तविकताओं से खुद को वाबस्ता किया।रूमानियत और प्रेम से भरे अपने शुरुआती दिनों में फ़ैज़ ने भी अपने लेखन की शुरुआत वस्तुतः फ़ारसी की पारंपरिक शैली की नज़्मों से की जहां वह युवा मन के स्वप्नों और एकतरफ़ा प्रेम की बातें करते हैं। नक़्श-ए-फ़रियादी की शुरुआती नज़्में फ़ैज़ की उन्हीं भाव दशा को दिखलाती है। पर 1930 के दशकों में जब से फ़ैज़ पर प्रगतिवादियों और विशेषकर रशीद जहां, महमुद्दूज़फर, सज्जाद ज़हीर इत्यादि का प्रभाव पड़ता है, जब वह अमृतसर के मेओ कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए थे, फ़ैज़ की संवेदनाओं में बदलाव की आहटें शुरू हो जाती हैं। यह अपने अब तक के रोमानी भावुकता से भरे लेखन से उनका एक सोद्देश्यपूर्ण अलगाव था। उनके अपने व्यक्तित्व के परिवर्तन के समानांतर उनकी कविता की ज़मीन भी अब अधिक यथार्थवादी आग्रहों से दरकने लगती है। हाँ, वो एक ऐसे समय में लिख रहे थे और उस विचारधारा के आग्रह के साथ लिख रहे थे जो कला को सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का ज़रिया मानने की पक्षधर थी, पर फ़ैज़ की शायरी ने इससे भी आगे जाकर कलम को एक व्यापक-वृहत मानवता से, वैश्विक सरोकारों से जोड़ा। फ़ैज़ बीसवीं शताब्दी के उन चंद अज़ीम शायर-कवि-विचारकों में हैं जिन्होंने कलम को क्रांति से जोड़ने का युगपरिवर्तनकारी कार्य किया। यह फ़ैज़ की अद्वितीय प्रतिभा और काव्य लेखन की उनकी विशिष्ट शैली थी कि उन्होंने कविता को सामाजिक मायनों से भरते हुए भी कभी भी उसे एक “प्रापगैन्डा” बनने नहीं दिया।
इस नज़्म की कई-कई व्याख्याएं हैं। उपनिवेशवादी सत्ता के सदियों के दमन या सामंतवाद के हाथों युगों से पीड़ित जनता के दुख को समझने की जहनीयत जब संवेदनशील मन में आती है तो सांसारिक -भौतिक-दुनियावी प्रेम जिसे अब तक जीवन का साध्य समझा जा रहा था, वह सब एकदम से बेमानी, खोखला, छिछला, सारहीन लगने लगता है। और प्रेम में अब तक डूबा हृदय कह बैठता है कि उससे अब पहली-सी मोहब्बत की उम्मीद न की जाए। पर यह नज़्म एक बड़े बारीक स्तर पर जीवन के उन रंगीन स्वप्नों, प्रेम के उन आश्वासनों के प्रति भी एक शोकगीत की तरह देखा जा सकता है। प्रेम में डूबे हृदय के पास, जैसा कि फ़ैज़ लिखते हैं “तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है“, एक वक़्त ऐसा भी होता है कि आस-पास का फैला संसार और उसकी समस्याएं, दुनियादारी के सभी बंधन, कुछ भी नहीं दिखलाई पड़ते। यही वह पहली-सी मोहब्बत थी जहां प्रिय के होने से ही संसार में बहारों की एक सुनिश्चित आवाजाही थी। यह एक ऐसे समय और दुनिया के स्थायित्व का आश्वासन था जो किसी भी तरह के तूफान से संरक्षित था। प्रिय के होने मात्र से, यह हयात माने यह जीवन रोशनियों से जगमगाता था। इस पहली सी मोहब्बत में अपने आप को भी खो देने का आलम यह था कि प्रिय की आँखों के सिवा, उन आँखों को देखने के सिवा दुनिया में कोई और इच्छा शेष नहीं थी। प्रेम में आत्म-विस्मृत हो जाना, दुनिया की सुध बुध भुला कर खुद को भी खो देना उस प्रेम की सबसे बड़ी निशानी थी। मानो जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया हो, एक ही दिशा, एक ही मंजिल रह गई हो जो मिल जाने पर क़िस्मत पलट जाएगी, भविष्य का लिखा बदल जाएगा, वक़्त का रुख बदल जाएगा। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था, पर हां प्रेम में विभोर हृदय इन सब बातों की कल्पना कर रहा था। अगली कुछ पंक्तियाँ इस नज़्म की कुछ क्रान्तिकारी पंक्तियाँ है। दरअसल विचार हैं। यही वो शिफ्ट, यही वो परिवर्तन है जो अब प्रेमी के हृदय में आ चुका है। “और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा”…….. ऐसा लगता है मानो किसी एक दुर्लभ क्षण में यह एक दिव्य ज्ञान जिसे शायद अंग्रेज़ी में epiphany कह सकते हैं, प्रेमी को हुआ है, जहां उसे अब तक जिए गए जीवन की और उससे भी अधिक प्रेम पर अपने अस्तित्व की सार्थकता की बानगियाँ सहसा निरर्थक लगने लगी हैं। उसे यह लगने लगा है कि प्रेम में दुख उठाने के अलावा भी दुनिया में कई दुख हैं। वह दुख जो अधिक वास्तविक हैं, जो निजी न होकर पूरी समष्टि के दुख हैं। यहाँ पर मुझे, फ़ैज़ के विचारों-सी ही मिलतीं, जाँ निसार अख़्तर की आखरी ग़ज़ल की यह पंक्तियाँ भी बरबस याद आती हैं, जब वह फिल्म रज़िया सुल्तान के एक गीत में लिखते हैं ” कितने घायल हैं, कितने बिस्मिल हैं, इस खुदाई में एक तू क्या है, ए दिल-ए-नादान, ए-दिल-ए नादान”। प्रेमी फ़ैज़ को अब सिर्फ मोहब्बत में मुब्तिला अपने दिल और शोक से अधिक जरूरी दुनिया के दुख लगते हैं। एक लंबे विरह के बाद मिलन के क्षणों की जो राहतें हैं, जो सुकून है उसके अतिरिक्त भी कई और राहतें हैं जो एक अधिक सार्थक संतुष्टि का बाइस हैं।
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

फ़ैज़ उस पुरानी मोहब्बत से यूँ छिटक कर अपने आप को,अपनी संवेदनाओं,अपनी चिंताओं को एक बड़े, वृहत्तर जीवन-जगत के सरोकारों से जोड़ना चाहते हैं। और कुछ नए से जुड़ने में लाज़मी है कि पिछला कुछ, पुराना कुछ छूट जाए या छोड़ा जाए। इसीलिए कहीं-न-कहीं इस नज़्म में उस छोड़ दी गई मोहब्बत के प्रति भी एक तरह का मर्सिया ही गाया है फ़ैज़ ने। पहले उस पिछले संबंधों की गर्माहट को, उसके ज्वार को, उसके पागलपन को याद किया गया है और फिर ज्वार के शांत होने और फिर से उन्हें जगा न पाने की अक्षमता को फ़ैज़ स्वीकार कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि यह जो एक मौन-सी, कातर-सी अपेक्षा उनके महबूब की है कि उसे वह अपनी पुरानी मोहब्बत दें, यह अब कितनी बेमायना है। वह उस मोहब्बत को दे पाने में असक्षम हैं। चाह कर भी वह उस पुरानी आंच को, या अपने उस उन्मत्त प्रेमपूर्ण संवेदनाओं को जगा नहीं सकते। नज़्म की आगे की सभी पंक्तियों में फ़ैज़ अपनी इस अक्षमता के कारण गिनवा रहे हैं:
अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
ध्यान दें कि माशूक का हुस्न अब भी दिलकश है, पर मोहब्बत की वह तासीर जब ठंडी पड़ गई हो तो वह दिलकश हुस्न भी अपनी ओर मुतासिर कर पाने में असमर्थ है। क्योंकि अब प्रेमी के पास सांसारिक दुखों और उन दुखियों के मायूस, बेजान, निरीह चेहरे हैं जिनके साथ युगों से शोषण होता आया है। एक ऐसे वर्ग को हमेशा पददलित , शोषित बनाए रखा गया जिसके मूल्य पर एक सामंतवादी-पूंजीवादी वर्ग फलता-फूलता रहा। फ़ैज़ लिखते हैं कि शोषण की वहशी दुनिया का यह एक ऐसा अंधेरा तिलिस्म था जिसे मखमली , जगमगाते कपड़ों की तहों में छुपा कर रखा गया था। यहाँ वह उस सामंतशाही को और एक अधिक वृहत्तर अर्थ में उस औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन की ओर भी संकेत कर रहे हैं जिसने अपने ज़ुल्मों को एक पूरी सभ्यता पर जारी रखा और वह भी अपने शोषक चेहरे को छुपाये हुए। पर उस छुपे हुए मायाजाल के चिह्न हर जगह बिखरे हैं, जिसे कोई भी संवेदनशील हृदय अपने हर ओर देख सकता है। और फिर फ़ैज़ शोषण के उन तमाम रूपों को नज़्म में जिस मार्मिकता से उद्घाटित करते हैं वह वस्तुतः हमारे सामने सभ्यता के वर्ग संघर्ष की तस्वीरों को जीवंत कर देता है। यह काफ़ी है फ़ैज़ को अपने स्वप्नों की, संरक्षित-सीमित दुनिया के सुखों से खुद को दूर कर लेने के लिए। अपने आप को उस मज़लूम जनता के दुखों के साथ खड़ा कर लेने के लिए जिसे वह अपनी मोहब्बत के रूमानी दिनों में भूले हुए थे। सहसा फ़ैज़ प्रेमी से अधिक एक सतर्क-संवेदनशील-जागरूक-आत्मचेतस नागरिक में तब्दील हो जाते हैं।
पर यह कायांतरण अपने कर्तव्य की स्मृति में भी अपने प्रेमी हृदय को एक अपराध-बोध से युक्त पाता है। उसे क्षोभ अवश्य है अपनी उस मोहब्बत की आंच के मंद पड़ जाने का। पर वह अपनी असमर्थता को ही ज़ाहिर कर रहा होता है जब वह अपनी बदली हुई चिंताओं के कारण बताता है। यह नज़्म अंत भी फ़ैज़ उन्हीं दो पंक्तियों पर करते हैं कि और भी दुख है ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा, क्योंकि अब उनके पास एक जीवन को देखने और जीने का एक बड़ा उद्देश्य है। उस उद्देश्य के समक्ष मोहब्बत जैसी भावनाओं का मूल्य उतना नहीं रहा जितना हुआ करता था। यह एक सचेतन निर्णय है खुद को उस प्रेम से अलग कर लेने का। प्रेमी अब भी मोहब्बत के हसीन स्वप्नों की दुनिया में मुब्तिला रह सकता है क्योंकि उसी ने कभी यह कहा था कि “तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है” पर उसकी संवेदनशीलता का यह परिवर्तन उसका सचेतन अलगाव है एक बड़े लक्ष्य के प्रति स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए।
पर इस नज़्म को अगर फ़ैज़ अपनी इस उद्घोषणा पर खत्म करते हैं तो बतौर पाठक मुझे उससे भी आगे बढ़ कर यह सोचने का मन होता है कि फ़ैज़ ने अपनी सामाजिक पक्षधरता और कर्तव्यनिष्ठता के मद्देनजर अपना यूँ मोहब्बत से दूर कर लेना तो बतलाया, पर उनकी पुरुष दृष्टि कभी भी उस पीछे छोड़ दिए या छूट गए महबूब का पक्ष क्यों नहीं दिखला सकी ? एक बेहतर और बड़े कर्तव्य का बोध क्या केवल एक पुरुष का विशेषाधिकार है? ऐसा लगता है कि शुरू से लेकर अंत तक फ़ैज़ ने उस अनाम-अरूप महबूब को भी कोई निर्णय लेने की कोई एजेंसी नहीं दी। वह टूट कर प्रेम किए जाने के योग्य तो है, जिसके प्रेम में खुद को, दुनिया को भुलाया जा सकता है, पर वह उतनी ही सरलता से छोड़ भी दिए जाने योग्य है। ऐसा लगता है यह दो अलग-अलग दुनिया हैं जहां पर एक की दूसरे में आवाजाही संभव नहीं है। प्रेमी की ऊर्जा इतनी सीमित है और दृष्टि इतनी संकरी कि वह एक समय में केवल एक ही को अपनी तवज्जोह और वफ़ादारी दे सकता है। क्या इन दोनों ही दुनिया को साथ लेकर नहीं चला जा सकता था? और जिस प्रकार से अब उसकी दृष्टि समष्टि के दुखों पर लगी है, एकबारगी को यह विश्वास नहीं होता कि यह वही हृदय है जो कभी महबूब की मोहब्बत के इतने बड़े-बड़े दावे कर रहा था।
पर क्या उस महबूब के पास सिवाय उसके रूप के आकर्षण के क्या कोई ऐसी धरोहर नहीं थी जो उसके प्रेमी को जीवन में उसकी भी, उसके भी प्रेम की उपादेयता बता सकती? कल तक जिसे अपने प्रेमी की तवज्जोह, उसका प्रेम, हर वक़्त उपलब्ध था, वह जो उसका संसार थी, उसकी समस्त चिंताओं का केंद्र थी वह अपने यूँ इस तरह हाशिये पर डाल दिए जाने से क्या महसूस करती होगी? जो वक़्त बीत गया वह उसकी कल्पनाओं में बीता था? या जो घटित हुआ था वह एक जियी गई सच्चाई थी, जिसे अब एक पक्ष ने बिना उसकी सहमति या बिना उसके जानकारी के चुपचाप कहीं मौन में दबा दिया? उस महबूब के मनोभावों पर भी तो नज़्में लिखी जानी चाहिए थीं। बतलाना था कि मोहब्बत के, स्नेह के आधार को किसी बड़े उद्देश्य के आड़े छीन लिए जाने पर, अपनी असमर्थता का वास्ता दिला कर उस विगत जीवन को मिथ्या साबित कर देने के बाद महबूब ने अपने जीवन की दिशा कैसे तय की? कुछ गीत उसके शोक के भी लिखे जाने चाहिए। कुछ नज़्मों में यह भी दिखलाना चाहिए कि जीवन के नए मायनों की तलाश उसने कैसे की? या केवल इतना भर ही कि उस छूट गए महबूब का क्या बना ?
बहरहाल, फ़ैज़ और उनकी नज़्मों के विश्लेषण का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं हो सकता। यहाँ अब हम इस नज़्म के कुछ बेहद सुंदर renditions जिसे समय समय पर अलग अलग गायकों ने गाया है, उसे इकट्ठा करते हैं, ताकि हम सब उसे सुन सकें और संगीत की शाश्वतता का लुत्फ़ उठा सकें।






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