अंदाज़ा….

एक दिन बड़ी बेसब्री से मुझे 

ढूँढने ज़िन्दगी आई। 

मेरे उदास होठों पर अपनी निगाहें जमा कर

वह पूछती है कि यह क्या, 

तुमने मुस्कराहटें कहाँ खो दी हैं अपनी ?

पर होठों ने कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा।  

आँखों ने ही तब हौले से ज़िन्दगी को इशारा किया 

कि तुमने ढूँढने में जो देरी की 

तो उन्होंने चुप हो जाने की क़सम खा ली है।  

ज़िन्दगी मानो अवाक हो गई……. 

और फिर वज़ाहतों की गिनतियाँ शुरू की 

कहा उसने, मैं आती ही तो थी पर

ज़रा तुम्हारा पता 

मुझे ग़लत पता था।

न जाने मैंने कितने दरवाज़े 

ग़लत खटखटाये 

कितनी गलियां, कितने शहर 

ग़लत छान मारे। 

तुमने ख़ुद को इतनी तहों में छुपा रखा था 

कि कई बार तो ठीक तुम्हारे 

सीध में होने पर भी तुम 

तक देख नहीं सकी, और

अब जब जाने कितने क्षणों, कितनी

सदियों को लांघ कर तुम तक आई हूँ 

तो तुम मुझसे भरे नाराज़गी बैठी हो ?

आँखों ने ज़िन्दगी की एक न सुनी और मेरे

पक्ष में कहा

उससे यूँ ख़फ़ा होने का अधिकार तो सिर्फ़ मेरा है 

वह क्या नहीं समझती थी 

कि मुझे भी कुछ जादुई घटते देखना था? 

कुछ ऐसा पा जाना था जो मैंने सोचा भी न था,

देखना था कि यक़ीनों से परे कुछ हासिल होने पर

आँसू और मुस्कराहटें कैसे होड़ लगाती हैं !

मेरी हठी बचकानी ख्वाहिशों पर ज़िन्दगी 

भरपूर मुस्करायी और 

कहने लगी मैं तो अंदाज़ा लगाती थी कि

मेरी सबसे बड़ी सौग़ात तुम ख़ुद-ब-ख़ुद हो,

एक चलता फिरता स्वप्न तुम स्वयं हो

अपने में इतना अनोखा कि तुम तक पहुँचने को,

तुम्हारी खोज में मैं ख़ुद निकल पड़ी।

भला सोचो ज़रा

वो प्यासी चिरैय्या जब तुम्हारे रखे पानी के कुल्हड़ में

चोंच भर पानी पीती है तो

वो जादू तो तुम ही करती हो!

सड़क किनारे बैठी वह अनाथ बुढ़िया

न देख पाने पर भी केवल तुम्हारे कदमों को

पहचानती है, ठीक उस समय जब तुम चुपचाप

उसके आँचल में कुछ डाल जाती हो।

उसका यूँ बिन माँगे कुछ हासिल हो जाना

हर रोज़ तुम से ही तो है।

अनजाने ही तो तुम

फेरती हो अपनी निगाहें उन पर

जिन्हें कोई नहीं देखता।

तुम्हारी वह निश्छल मुस्कान उनके भी हिस्से आती है जो

थके और पराजित हैं।

यूँ हर रोज़ हर पल जाने कितने रंग तुम अपनी कूचियों में

भरे कर देती हो रंगीन सबकी उदासियाँ।

फिर तुम्हारे यूँ चुप हो जाने का

तो कोई सबब नहीं बनता।

देने के सुख से भी बढ़कर क्या कहीं पाने का सुख है?

तुम अनजाने ही मुझे जीती चली आयी हो और

इसका अंदाज़ा भी नहीं!

कह कर ज़िन्दगी भरपूर मुस्कराती है और

मैं…………मैं……… उसे अवाक देखती हूँ।

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