वसीयत…

वसीयत…

जब कभी सफ़ेद बादलों के बीच गुज़रते

प्लेन से नीचे झाँकती हूँ, तो मुझे

अपनी वसीयत कर जाने का मन होता है।

डरती हूँ कि जो इन बादलों की तरह ऊपर ही रह गयी, जो

अबकी ज़मीन का मुंह न देख सकी तो मेरी

मिलकियतों का क्या होगा?

यूं तो ऐसा कुछ नहीं , कुछ भी नहीं मेरे पास

न विरसे में मिली कोई थाती, न कोई गड़ा खज़ाना

न ही शहर-दर-शहर फैले मकान, न चमकता हुआ कोई गहना

न कोई चोर दरवाज़ा, पर फिर भी अपनी

वसीयत लिख जाने को जी चाहता है, कुछ तुम्हारे,

केवल तुम्हारे नाम कर जाने को जी चाहता है।

बड़े-बड़े हर्फों में बता देना चाहती हूँ कि

बचपन की कुछ तस्वीरें उस पीले पड़ गए लिफ़ाफ़े में मैंने रख छोड़े हैं,

बचाकर नज़रें सबकी तुम वह सहेज लेना और

जो पिछले कमरे में एक दराज़ है न भारी-सी, जो बिना तुम्हारे

हाथ लगाए नहीं खुलती, उस में कुछ

अधूरी कवितायें, तुम्हारे उकसाने से शुरू की गई कहानियाँ,

सबसे छुप छुप लिखी डायरियाँ पड़ी हैं, वह अपने नाम कर लेना।

अलमारी में सालों में जुटाई गयी

मेरी तमाम रंगों की ओढ़नियाँ, किसी मज़ार

की जालीदार खिड़कियों में बांध आना, उस पुराने पीर को

मेरी शदीद इबादत का तो पता चल जाएगा, फिर भले

कोई ज़रूरतमन्द उन्हें खोल ले जाये, मेरा रंग

उनके दामनों पर भी तो चढ़ जाएगा।

रसोई में एकदम सीध पर एक शीशे के मर्तबान में

मेरी पसंदीदा अचार पड़ी रहती है , ज़रा उसका

ज़ायका तो संभाल लेना, आँगन के गमलों में

जो पौधे लगा रखे हैं न, बड़ी जतन से उनमें मैंने फूल पाये हैं

उन फूलों को यूं तन्हा न छोड़ना, उनसे सट कर

ही रखी जो बेंत वाली कुर्सी है न, हाँ….वही…..जिस पर बैठ

मैं अपने ख़्याल बुनती हूँ, वह केवल

अपनी ही धरोहर समझना, आँगन चाहे जिसके मन भाए।

इतना ही, बस इतना ही सब तो

तुम्हारे सुपुर्द कर जाना है ताकि जो कभी

बादलों में ही रह जाऊँ तो बड़े सुकून से

कह सकूँ, मैंने वसीयत कर रखी थी।

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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