बारिश..

बारिश..

नहीं देती ज़िंदगी वजहें तुमसे मिलने की  

कोई ऐसा सिरा भी मेरे हाथों में नहीं थमाती कि 

उससे बंधे बंधे तुम से आ मिलूं 

जीवन की रंगीन परछाइयाँ सी भी तो तुम्हारी  

कभी भूले से मुझ पर नहीं पड़ती 

कि ठंडी छाया में जिसकी बैठ 

चंद घड़ी इत्मीनान के ही पा सकूं।  

बस दूर से देख भर लेने की ही है कुछ मोहलत 

जिनमें पूरे वजूद से झाँक लेना चाहती हूँ

हर वो कोना , हर वो दालान 

जिससे लग कर रखी हुई हो कोई उदास कुर्सी 

कि महसूस कर सकूँ तुम्हें 

कभी ऊँघता सा उस पर 

तो कभी चादर में लिपटी हुई तुम्हारी सर्दियाँ।

सामने मेज पर पड़ी तुम्हारी घड़ी के वक़्त से

अपना जीवन मिला लेने की कल्पना

वह कुछ घिस से गए आलमारी में मानो खुद को सहेजना

कांच के दरवाजों से बाहर को दिखती कोई वादी

हाँ…….. वादी ही हो कोई शायद

जिस पर पसरे कोहरे से छन छन कर

भीतर तैर जाती हुई मेरी साँसे

कोहरे की मानिंद ही ठंडी कुछ गीली।

कुछ पहर गुज़रे रात में नींद से उनींदी आँखें

अब उस चारपाई पर बिछ ही तो जाएंगी

की रतजगों की नीरव थकान बस अब एक

झपकी में टूट जाएगी।

मेरी कल्पना के ये चित्र तुम्हारे जीवन से हैं 

यह दिलासा, उफनते मेरे मन को 

तर कर जाता है। 

देखा नहीं जो कभी तुम्हारी दुनिया को तो अपने एहसासों में 

ही उसे रचती आई हूँ , कोई सुंदर कल्पना भी नहीं

निर्मम यथार्थ को उकेरता सा मेरा मन

अपने अनुभवों से चाहा है 

तुम्हें तय कर लेना , पर एक मूक सी निरर्थकता 

जिसे तुम तक अभिव्यक्त कर सकूँ 

इससे बेहतर पाया है चुप हो 

जाने का विकल्प , कम-से-कम

इस सदी के लिए।

बेहतर ही तो है न मेरा बस दूर से 

तुम्हारे जीवन को यूँ चुपचाप 

निर्निमेष देखना 

और देख कर हुई अनुभूति को 

स्वयं अपने मन से भी न कहना 

अनसुना अनदेखा कर आगे बढ़ते जाना 

कि किसी दिन मेरे आँखों का विद्रोह 

तोड़ दे सभी बाँध 

और बस कोई घना बादल बन अपनी हदों 

से छूट कर तुम्हारे शहर में 

झमाझम मेरा बरसते जाना

वादियों को लांघती

कोहरों को पिघलाती

दालानों को बहाती मेरे जीवन की बारिश।

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