आँखें…

आँखें…

दूसरों की आँखों में

जाने क्या तलाशती है ये आँखें,

क्या है जिसे सुनना चाहते हैं ये कान

वो शै जिसे महसूस करना चाहती है ये रूह।

अपनी और झांकने वाली

आँखों में

शायद कोई पुरानी गर्माहट-सी

अपनाइयत ,आवाज़ में वो फुसफुसाहट सी

निश्चिंतता, बिना किसी ग़ैरज़रूरी

जोश से भरी, वो बदन का यूँ एकदम ढीला

छोड़ बेतकल्लुफ़ी

से भरा रवैया, मानो सामने बैठा हो कोई

बेहद अपना।

पास जिसके होने पर बातों की भी

न हो ज़रूरत कि

काफ़ी हो बस चुपचाप देख जाना।

शब्दों से , उनके कहे जाने के लहजे से

जब अनजाने खींच लेते हैं

लोग दीवार अपने

इर्द गिर्द, तो

उनसे टकराने वाली

आवाज़ इस तरफ़ पहुँचती ही नहीं

और जो कानों के

मार्फत पहुँचे भी तो

भीतर तक तर नहीं करती , एक

छटपटाती हताशा ले कर

बस

संवाद ख़त्म होने की कातर प्रतीक्षा

में हर कोई

बस बन जाता है

एक अजनबी ,परिचय की किसी भी

ऊष्मा से रहित ,

एक देखा हुआ

चेहरा और अपनी

अपेक्षाओं में गोते लगाती आँखें ,वापस

ख़ुद पर

खीझ जाती हैं।

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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