साँझ…..

साँझ…..

यह साँझ सुनहरा ओढ़े तुम, किरणों में लिपटी आना 

यूँ पत्तों में लुकते छिपते, रात ज़रा थम के आना।  

सूरज के ढलने की बेला, जब धरती गगन से मिलती है 

उस क्षितिज को आँखों में मेरी, कुछ पल को तुम ठहराना।  

आसमान ने ठीक इसी क्षण, धूसर चादर तानी है

हरियाली छितराए धरती, बनी ठनी कोई रानी है। 

मेघों की लम्बी पाँतों से, किरणों की झांका तांकी है

दम साधे रात है बैठी क्यों, शाम अभी तक बांकी है। 

सूरज ने भी दिन की थकन, अब जाकर के उतारी है 

साँझ का पहला चमका तारा, रात की कोई सवारी है।

पेड़ों पर भी लौट गए हैं, उसके सब रहनेवाले 

गुंजाते हैं आसमान को, ये पंछी भी मतवाले।

चुपके से रजनी ने आकर, साँझ को गले लगाया है 

इस अंधकार के सागर को, जादू से मानो फिराया है।  

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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