जो कभी पा जाओ सुकून तो कहना।
झलक भर से उसकी
क्या पता
उफनते हुए इस मन को भी
थोड़ी ठंडक
ही मिल जाए
प्यासे इन होंठों पर तरावट
फैल जाये,
जो तुम पा जाओ सुकून तो कहना!
थोड़ी ख़ुद से हो फ़ुर्सत कभी तो कहना।
झाँक लेना यूं ही एक बार
इस तरफ भी, कभी नज़रें फेर देना
भरम ही कम से कम तो
बना रहे तवज्जोह का तुम्हारी
हो ख़ुद से फ़ुर्सत कभी तुमको तो कहना!
लगे सन्नाटा भरने जब भीड़ में भी तो कहना
एक ख़ामोश याद
ज़ेहन में कौंध जाए
और फाँस सी महसूस हो
हलक के नीचे तो
होने का मेरे प्रमाण होगा उसे मुश्किल से
यूँ तुम्हारा निगलना
लगे सन्नाटा भरने जब तो कहना!
जब भर जाए जी दुनियादारी से तो कहना।
होने लगे अपने आप
से भी जब ऊब, निरुद्देश्य भटकते
कभी, अंदर के
सभी बंधनों को तोड़,
एक अनजान अनाम आकर्षण से बंध
उस फाँस की तलाश में
जोगी हो जाना और
जो इस यात्रा में ही
अपने होने की सार्थकता मिल जाये तो कहना!







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