यादों के बोल…..

मेरी पीढ़ी के अधिकांश लोगों को हमारे बचपन के कुछ धुनों की याद बरबस ही होगी। स्मृतियाँ एक ऐसे निम्न मध्यमवर्गीय बचपन की जहां एक छोटे से टी. वी सेट पर एकता कपूर (प्रायः) के धारावाहिक सप्ताह के पाँच दिन आया करते थे और हम सब चाहे किसी भी उम्र के हों, चाहे किसी भी शहर में रहते हों पर उन धारावाहिकों के गीतों को नींद में भी गुनगुना सकते थे।

एक ऐसा दौर जब इतने फ़ैन्सी मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया और इंटरनेट नहीं हुआ करते थे और मनोरंजन का एकमात्र साधन इन छोटे-छोटे गुमनाम शहरों में ये धारावाहिक ही थे। गृहणियाँ जो दिन का काम जल्द-से-जल्द इसलिए निबटा लेतीं ताकि बच्चों के स्कूल से आने से पहले अपने मनोरंजन का कोटा पूरा कर सकें। आधे-आधे घंटों के धारावाहिकों के काल्पनिक संसार में डूब कर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की बोरियत को कुछ देर के लिए परे सरका सकें। मैंने खुद अपने बहुत सारे होम वर्क स्कूल से आते ही इसलिए निबटा लिए होंगे ताकी रात को मां और दीदी के साथ सीरीयल देखने का नैतिक अधिकार हम छोटे बच्चों को भी मिल जाए। वह भी क्या दिन थे!

पर अब जब सालों बाद पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो इन धारावाहिकों की कहानियों से अधिक मुझे इनके एक से बढ़कर एक टाइटल ट्रैक ही याद आते हैं। आज के भागते हुए बिन अर्थों के गानों के युग में भी ये पुराने धारावाहिकों के गीत जो अधिक मधुर और सार्थक थे वह यूँ ही याद रहते हैं। यहाँ उन्हीं कुछ गीतों को फिर से गुनगुनाने और याद करने की कोशिश है। इसमें कई ऐसे भी हैं जिन्हें देखा न भी हो पर उसके गीत ज़ेहन में ऐसे बसे हैं मानो कोई पुराना स्वाद जो सालों बीत जाने पर भी ज़बान पर चढ़ा होता है।

पहले के धारावाहिकों के गीत उस समय की संवेदनशीलता के अनुसार होने के बावजूद इतने मधुर थे। संवेदनशीलता से मतलब एक ऐसे समय से जहां जीवन इतना महत्वाकांक्षी न था, विशेषकर स्त्रियों के संदर्भ में जहां अधिकांश के लिए शिक्षा की उपादेयता एक अच्छे विवाह में परिणति मात्र थी। घर-परिवार को संभालती हुई स्त्री की छवि एक सफल स्त्री की परिभाषा थी। ऐसे अनेकानेक धारावाहिक थे जो जीवन के इसी पक्ष को सबसे अधिक विश्वसनीयता से दिखलाते थे। ऐसे धारावाहिकों के गीत भी उसी सोच को दिखलाते थे। मसलन घर एक मंदिर , कहानी घर-घर की जैसे धारावाहिकों के गीत उनकी कहानी को बयां करते थे। उनके बोल हमारे आज के विचारों से मेल भले न खाए पर इसमें उनका कोई दोष नहीं बल्कि वह उस पूरे युग की संवेदनशीलता के कारण था। कामकाजी महिलाएँ छोटे शहरों में बहुत नहीं थीं। स्त्रियाँ प्रायः गृहिणयाँ थीं। जिसे हम आज फ़ैन्सी शब्दों में होम मेकर कहने लगे हैं। इसीलिए इन धारावाहिकों जिनकी कहानियों में ऐसी ही स्त्रियाँ -जो घर-परिवार की धुरी हुआ करती थीं, त्याग-सहनशीलता की जीवंत मूर्तियाँ- उनके गीत भी उन्हीं गुणों को महिमामंडित करते थे। पर संगीतात्मकता की दृष्टि से बड़े मधुर थे। अनुराग बासु जो आज के बड़े निर्देशक हैं, उनके करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने कोशिश एक आशा सीरीयल बनायी थी। ज़ी टीवी पर आने वाला यह धारावाहिक हर घर में शायद देखा गया होगा।अपने समय के कुछ बेहद अच्छे कलाकारों ने इसमें रोल किया था। बाद में मैंने इसकी कहानी पढ़ी थी। पर इसका टाइटल ट्रैक बड़ा प्रसिद्ध हुआ था।

इसी प्रकार कोरा काग़ज़ जैसे धारावाहिकों ने रेणुका शाहाने और सलील अंकोला जैसे अभिनेताओं को घर-घर में प्रचलित कर दिया था। थोड़े प्रौढ़ और गम्भीर मुद्दों पर बनने वाले इन धारावाहिकों में जीवन की ही समस्याएँ रहा करती थीं पर सब के केंद्र में प्रायः स्त्रियाँ थीं। बात सिर्फ़ समय से अधिक उस धारावाहिक के मुख्य टार्गेट ऑडीयन्स की भी थी।चूँकि इन धारावाहिकों को मुख्यतया स्त्रियाँ देखती थीं तो उनके जीवन को केंद्र में रख कर कहानियाँ लिखी गयीं और पर्दे पर दिखलाया गया। वह विक्टिम भी होती पर अंततः उसे जीतता हुआ, परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में करता हुआ भी दिखलाया जाता था। इस धारावाहिक की मुख्य किरदार पूजा एक गलत शादी के बाद किस प्रकार ससुराल में ही रह कर अपने जीवन को वापस से पटरी पर लाती है, भले ही स्त्री के आत्मविश्वास और संघर्ष की कहानी हो, पर अंततः वहां भी हालातों से समझौता इसलिए किया गया है ताकि उसके माता-पिता की अपने समाज में बदनामी न हो। पूजा इसलिए वापस अपने घर नहीं लौटती और ससुराल में ही अपने संबंधों को सुदृढ़ करती हुई आगे बढ़ती है। कोरा काग़ज़ के टाइटल ट्रैक के बोल इतने गहरे और अर्थों से भरे हैं कि ग़ज़ल जैसा प्रभाव उत्पन्न करता है। गीत में, जीवन में मिलने वाली हताशा और निराशा को इतने सार्थक शब्दों में ध्वनि दी गई है कि एक व्यक्ति के आत्म-निर्वासन को समझा जा सकता है। साधना सरगम ने अपनी पुरकशिश आवाज़ में इसे गाया है। और सबसे अच्छी बात है कि पहले के इन धारावाहिकों के गीतों में भी गाते समय तलफ़्फुज़ का इतना ध्यान रखा गया है कि न केवल भाषा के प्रति सम्मान दिखता है बल्कि सुनने का प्रभाव भी दुगुना हो जाता है।’चंद साँसों के अलावा कोई भी अपना नहीं’ में जो मार्मिकता है वह साधना जी की आवाज़ की उदासी ने उभार कर रख दिया है। पूरा ट्रैक ही अपने आप में एक सुंदर कविता है।

जिंदगी कुछ तो बता, आखिर तुझे क्या हो गया /आईना धुन्धला गया या मेरा चेहरा खो गया।

दिन है जंगल सा, पहाड़ों सी अकेली रात है/दूर तक कोई नहीं, तन्हाइयों का साथ है;

यूं बहार आयी चमन में , आशियाना खो गया/ आइना धुन्धला गया या मेरा चेहरा खो गया…

दिल है अरमानों से खाली, आँख में सपना नहीं/चंद सांसों के अलावा कोई भी अपना नहीं,

मेरी क़िस्मत लिखते-लिखते मेरा मालिक सो गया/ आइना धुन्धला गया या मेरा चेहरा खो गया

रंग मेहंदी का उड़ा, आँखों से काजल बह गया/खो गई सारी कहानी कोरा काग़ज़ रह गया।

रूठ कर मंजिल से मेरी मेरा रास्ता खो गया; आइना धुन्धला गया या मेरा चेहरा खो गया।

कोरा काग़ज़ की तर्ज़ पर ही सोनी टीवी पर हिना धारावाहिक का प्रसारण होता था। एक मुस्लिम परिवार की कहानी को व्यावसायिक मनोरंजन के एक प्रसिद्ध प्लेटफ़ॉर्म पर दिखलाने का शायद यह पहला प्रयास था। निर्देशक जावेद सैयद थे और कई अच्छे अदाकारों ने इसमें अभिनय किया था। एक लड़की हिना की कहानी थी और कई स्तर पर निकाह फिल्म की कहानी से प्रेरित थी। परंपरा और परिवार के बंधनों में फंसी हिना किस प्रकार जीवन में आगे बढ़ती है कहानी का मूल यही था। इस धारावाहिक के टाइटल ट्रैक के रूप में जगजीत सिंह के एक प्रसिद्ध ग़ज़ल को जो उन्होंने अर्थ फिल्म (1983) के लिए गाया था, लिया गया था, कारण कि इसके बोल अंततः हिना के जीवन को ही परिभाषित करते थे। “कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं” न केवल हिना के जीवन को बल्कि एक स्त्री की संवेदना को भी अभिव्यक्त करते थे।

पर समय के साथ साथ न केवल जीवन में बल्कि उनके आधार पर लिखी जाने वाली कहानियों में भी परिवर्तन आने लगा। स्त्रियाँ अब परिवार और पति पर आश्रित घर को अपने त्याग से चलाते रहने वाली कठपुतलियाँ मात्र नहीं थीं। अब उन्हें अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता ने अपने अस्तित्व के लिए भी सचेत किया था। समाज में ऐसे परिवर्तन भी हम नब्बे के दशक के एकदम अंत में और 2000 ईस्वी के बाद अधिक देखते हैं। छोटे शहरों में भी लड़कियां अब पढ़ाई अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कर रही थीं ताकि विवाह पर या अच्छा पति मिल जाने जैसी संभावनाओं पर ही आश्रित न रहना पड़े। विवाह तो परिवार और समाज की एक मात्र चिंता अभी भी कमोबेश है ही, पर परिवर्तन उस सोच में आई थी जहां लड़कियों को भी यह सोच कर सुदृढ़ किया जाने लगा कि वह शोषण को चुपचाप स्वीकार करने की नियति न झेलें जो उनसे संभवतः पहले की एक-दो पीढ़ी ने किया था। धारावाहिकों ने इस परिवर्तन को बड़े स्तर पर आत्मसात किया था, जो उस पूरे दौर की कहानियों में दिखलाई पड़ता है। अस्तित्व एक प्रेम कहानी जैसे धारावाहिक ने अपने नाम में ही नहीं बल्कि अपनी कहानी में ही एक स्त्री की अपनी पहचान की तलाश को केन्द्र बनाया था। इसके गीत में स्त्री आकांक्षा के साथ-साथ उसके हौसलों की भी ध्वनि मिलती है।

यह हिन्दी धारावाहिकों के लिए एक बड़ी बात थी, क्योंकि स्त्रियाँ अब तक या तो भुक्तभोगी थीं या नहीं तो उनका सामाजिक-पारिवारिक-सांस्कृतिक महिमामंडन ही अधिक किया जा रहा था। बहुत पहले एक धारावाहिक औरत आया करता था। रामायण जैसे धार्मिक शृंखला और निकाह जैसे सामाजिक फिल्मों के निर्माता-निर्देशक बी. आर. चोपड़ा ने दूरदर्शन के लिए यह सामाजिक धारावाहिक बनाया था। इसकी कहानी में एक प्रताड़ित स्त्री को ही दिखलाया गया था और इसके माध्यम से संदेश भी संभवतः यह ही दिया जा रहा था कि किस प्रकार स्त्रियाँ भारतीय समाज में पितृसत्ता के हाथों शोषित होती हैं और यह नहीं होना चाहिए। सामाजिक यथार्थ दिखलाने के साथ ही न केवल धारावाहिक का बल्कि इसके टाइटल ट्रैक का उद्देश्य भी सुधारवादी-उपदेशात्मक था। सुविख्यात ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने इसे अपनी आवाज़ दी थी। हसन कमाल ने इसके बोल लिखे थे और ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने देशभक्ति पर आधारित धारावाहिक शृंखला परमवीर चक्र, जिसे चेतन आनंद ने निर्देशित किया था, के सुप्रसिद्ध टाइटल ट्रैक ‘मेरे वतन’ को भी लिखा था।

परमवीर चक्र वैसे तो दूरदर्शन पर 1988 में पहली बार चलाया गया था, पर 1999-2000 के आस-पास भी इसे फिर से दूरदर्शन ने प्राइम टाइम पर लाया था। परमवीर चक्र प्राप्त युद्ध वीरों के जीवन पर आधारित यह शृंखला लोगों में इतना प्रसिद्ध था। इसके गीत को सुन कर कठोर से कठोर हृदय-मनुष्य की भी आँखें भीग सकती हैं। पंजाबी गायक अमींद्रपाल सिंह ने इसे आवाज़ दी थी।

जगजीत सिंह ने कुछ बेहद प्रसिद्ध धारावाहिकों के लिए भी गायन किया था। सांस नाम से आने वाला एक प्रमुख धारावाहिक जिसमें नीना गुप्ता और कंवलजीत सिंह मुख्य पात्र थे, उसके गीत को बेहद लोकप्रियता मिली थी। यह सब कुछ ऐसे धारावाहिक थे जिनकी थीम भी अंततः स्त्रियों को केंद्र में रख रही थी पर पुरुष मनोविज्ञान को, पुरुषों के पक्ष को भी निर्देशकों ने अब दिखलाना शुरू किया था।

2000 के दशक ने कुछ बेहद प्रसिद्ध धारावाहिकों के माध्यम से रोमांस और प्रेम से भरी नई कहानियों के युग की शुरुआत की। एक ऐसा समय जब वाकई धारावाहिक देखना हमने शुरू किया। स्टार प्लस, सोनी, ज़ी टीवी और विशेषकर बालाजी टेलीफ़िल्म्स ने के सीरीज़ की शुरुआत की। थोड़ी विकसित आधुनिकता पर स्थानीय संस्कृति के रंगों में रंगी कहानियों का दौर। बंगाली, गुजराती, मराठी परिवारों को केंद्र में रखते हुए प्रेम और संवेदनात्मकता से लैस कहानियाँ लिखी गईं। मेरी स्मृति में ऐसा पहला कोई गीत जो किसी सीरीयल का टाइटल गीत था और जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया था, वह कसौटी ज़िंदगी की का था। इतनी बड़ी नहीं थी कि गीत के बोल के मायने समझ सकूँ पर इतनी छोटी भी नहीं थी कि पर्दे पर गीत गुनगुनाते जोड़ों (अनुराग और प्रेरणा) के प्रेम और गीत के रोमांस को न समझ सकूँ। सोचती हूँ पहले इन धारावाहिकों के गीतों पर कितनी रचनात्मक ऊर्जा खर्च की जाती थी। संगीत इतना अच्छा, बोल इतने सार्थक और गाने वाले गायक भी नामी-गिरामी हुआ करते थे। गीतों के माध्यम से पूरे धारावाहिक को समझा दिया जाता था। ये गीत जान हुआ करते थे, पूरी कहानी की नब्ज़ होते थे। प्रिया भट्टाचार्या को उन दिनों सब जानते थे क्योंकि प्रायः बालाजी टेलिफ़िल्मस के लिए वही गाया करती थीं। पर कसौटी के इस गीत के लिए बाबुल सुप्रियो ने भी आवाज़ दी थी। संगीत इतना मधुर कि लगता कि किसी फ़िल्म का गीत है। नवाब आरज़ू के सुंदर गीतों को ललित सेन ने संगीत दिया था। इन सारे नामों के पीछे के चेहरों को शायद ही कभी देखा हो, पर उनकी संगत से जो गीत बना था वह उस पूरे युग को परिभाषित करने वाला था। उन दिनों जिन्होंने प्रेम करने की उम्र की दहलीज़ पर पाँव रखा था स्वयं को अपनी गली-मुहल्ले के अनुराग प्रेरणा का ही स्थानीय वर्ज़न बना लिया था। इन धारावाहिकों से अधिक इनके गानों ने प्रेम के नए अर्थ गढ़ दिए थे।

ऐसा ही एक गीत था, शायद सीरीयल का नाम ममता था। पर उसके टाइटल ट्रैक को श्रेया घोषाल ने गाया था।1-2 मिनटों के छोटे से गीत में जो हुनर गायकी का श्रेया घोषाल ने दिखलाया था वह बेजोड़ है। गीत के बोल तो अच्छे हैं ही पर संगीत और गायकी ने इतने छोटे से गीत में भी इतनी सारी सम्भावनाएँ रखी थीं। “ज़िंदगी मेरे साथ चल, मैं तेरी सौग़ात हूँ, होठों पर आकर जो रुक गयी, हाँ वही दिल की बात हूँ/ ये मेरा जीना सभी के वास्ते, ममता हूँ सब के साथ हूँ। ये सफ़र जीवन का ये सफ़र चल पड़ा अपना कारवाँ, ढूँढती है वो मंज़िल मुझे, हैं जहां मेरा आशियाँ”।

धारावाहिकों में प्रेम के पारंपरिक रूपों में भी धीरे-धीरे तब्दीली आई। अब प्रेम के साथ-साथ पात्रों की अपनी महत्त्वाकांक्षा और करियर भी ज़रूरी लगने लगा। इस सिलिसिले में कैसा ये प्यार है बहुत चर्चित हुआ था। कृपया और अंगद के माध्यम से एक आधुनिक प्रेम कहानी दिखलाने की कोशिश की गई थी। इसके टाइटल ट्रैक को उस समय के बेहद चर्चित और हाथों हाथ लिए जाने वाले गायक कुणाल गाँजावाला ने प्रिया भट्टाचार्या के साथ मिल कर गाया था।

इस शैली के धारावाहिकों में आगे चल कर पवित्र रिश्ता ने सबसे अधिक ख्याति प्राप्त की। कहानी के मुख्य किरदार मानव और अर्चना किसी भी भारतीय घर के साधारण चेहरे हो सकते थे और शायद यह ही उनके विख्यात होने की सबसे बड़ी वजह बना। सुशांत सिंह राजपूत को घर घर इस धारावाहिक ने प्रसिद्ध कर दिया। पारंपरिक कहानी होने के बावजूद नायिका को सशक्त दिखलाया गया था। कई सामाजिक समस्याओं को भी धारावाहिक में उठाया गया था। इस धारावाहिक के टाइटल ट्रैक ने बेहद प्रसिद्धि प्राप्त की।

बहरहाल, जैसे हम कहते हैं कि साहित्य समाज को दिखलाने वाला आईना होता है, उसी तरह धारावाहिक और सिनेमा भी समाज की ही छवियों से निकलते हुए उन्हें ही ग्रहण करने वाले माध्यम हैं। आज के सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के युग में जहां मनोरंजन की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं, वहाँ टेलिविज़न ने अपनी लोकप्रियता निस्संदेह खोई है। पर एक समय में इन्होंने मनोरंजन और कला दोनों ही की दृष्टि से जनता के दिलों पर राज किया था। पर जिन गीतों की बात हमने की है वह एक ऐसे समय की प्रतिध्वनियाँ हैं जब जीवन अपेक्षाकृत सरल था। मद्धम गति से चलते जीवन में कोलाहल कम था और इसीलिए इन गीतों में भी एक सुकून था, जिसकी ही कमी शायद आज के मनोरंजन में लगती है। किसी भी दो समय की तुलना करने में उस समय को परिभाषित करने वाले तत्वों-प्रवृत्तियों की तुलना करना भी स्वाभाविक ही है। संगीत और कलाएँ किसी भी समाज की उस युग-विशेष में कैसी प्रवृत्ति थी, उसे बतलाते हैं। इन पुराने धारावाहिकों और उनके गीतों के माध्यम से हम भारतीय समाज की संवेदनशीलता में, उसके युवाओं की आकांक्षाओं में, परिवार व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों की झलक देख सकते हैं।

One response to “यादों के बोल…..”

  1. Dr.Shambhavi avatar
    Dr.Shambhavi

    शुक्रिया, इन पुरानी यादों से राबता कराने के लिए ♥️

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