अपने पास….

दूर…….बहुत…… दूर हूँ

तुम्हारी व्यस्त शोहरतों की दुनिया से और

तुमसे।

एक कांच का पहाड़

जिसके पार तुम्हारा संसार दिखता भर है

पर जिसे भेद कर तुम तक आ सकूँ

छू कर महसूस करूँ, यह

संभव नहीं।

मेरी चुपचाप सूनी बस्ती में

दिन में भी सन्नाटा है।

यहाँ मैं हूँ और

मेरी अधूरी पूरी इच्छाएँ,

मेरी सफल असफलताएँ

मेरी निराश आशाएँ।

इन सबसे एक मौन सहजता पर

हमारे होने की यह कैसी विषमताएँ !

अक्सर यूं ही सोचती हूँ कि

तुम्हें नज़र न सही पर

उड़ती-उड़ती-सी

ख़बर मिलती तो होगी

मेरे होने की, मेरे

वीरान सन्नाटों की और अंततः

तुम्हारी दुनिया से ठीक विपरीत होने की।

कामयाब ख़ुशनुमा चेहरों की भीड़

में क्या बरबस ही सही पर

याद आता होगा

वह उदास मुस्कान लिया

एक सहमा चेहरा

जो इर्द गिर्द तुम्हारी जमा भीड़ में यूँ ही भटक

पहुँच कितना बेचैन था ?

क्या धरती के आकाश से जा मिलने की

वह असंभव असहजता

वह अनायास पहाड़ लांघ कर

मेरा उस पार पहुँचना

ध्यान आता है ?

मुश्किल होता है बेहद

खाइयों को पाटना

अपनी प्रवृत्तियों को बदलना।

सन्नाटों और चुप्पियों की मेरी वो दुनिया

जिनसे तुम्हें कोई सरोकार नहीं

उसी तरह मुझे भी तो

तुम्हारी दुनिया का वह शोर नहीं भाता

न मन होने पर भी हंसने

की विवशता

खुद को हद व्यावहारिक दिखाने

की बाध्यता

नामचीनों में घुलते रहने

की आवश्यकता।

इन शब्दों का अर्थ समझने में

ही मानो

मेरी यह साधारण ज़िंदगी चूक जाएगी।

कांच की पहाड़ी लांघ कर भी

तुम्हें पाने की मेरी चाह

तुम्हारी दुनिया के शोर में कहीं

दब जाती है और

फिर वही घबराहट वही बेचैनी

मुझे अपनी सूनी बस्ती में लौटा लाती है

अपने पास,

केवल अपने पास।

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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