
भला ही है यह समझते रहना कि बेरुख़ी
का तुम्हारी मुझे पता नहीं चला।
कि न ग़ौर किया हो तुम्हारा
यूँ दिन-ब-दिन आँखों से
ही नहीं पर
मेरे ख़यालों से भी ओझल होते जाना।
कि तुम्हारी चुप्पियों का मुझे अंदाज़ा न हुआ हो
कि तुम्हारी उपेक्षा
तुम्हारी मुझसे उदासीनता का
मुझे भान न हुआ हो।
ऐसा नहीं कि समझी न होऊँ तुम्हारा यूँ पलटना
या दिखायी न पड़ता हो तुम्हारा यूँ
मुझसे कटना
इतनी भी तो नासमझ नहीं पर
सिवाय एक सर्द सिहरन के उन्हें
स्वीकार कर लेने के
अलावा रास्ता ही क्या होता है।
कई दिन हफ़्ते महीने ख़ुद को यह
समझाने में जाते हैं
कि जो बीत गया वह वाक़ई
हुआ था, कि
वह गर्माहट से भरा समय भी
अपना जिया था।
वर्तमान की गहरी उपेक्षा
मानो स्मृतियों को भी धुंधला देती है
एक ऐसा अविश्वास
अपने ख़ुद के अनुभवों पर
अपने आप पर संशय उत्पन्न कर देता है।
पर समय की निर्मम लहरें जब उन स्मृतियों
को हल्का कर देती हैं तो
मानो उनपर अपना अधिकार भी
ख़त्म कर देती हैं।
एक ऐसी स्थिति जहां
टटका चुभने वाला दर्द नहीं होता, एक
घाव जो ऊपर से सूखा पर
भीतर कहीं गहरे में दिन-रात
रिसता रहता है।
एक टीस जो कभी अचानक उठती है
और सभी सोयी संवेदनाओं को
झिंझोड़ देती है,
हालाँकि वह कभी-कभार ही होता है।
फिर आती है वह स्थिति जब यूँ चीज़ों के
ठीक हो जाने की दबी हुई उम्मीद
भी दिल से
कूच कर जाती है।
किसी कमज़ोर क्षणों में की गयी वह प्रार्थनाएँ
एकदम बेमानी लगती हैं।
अब दिल को किसी मो’जिज़े का भी इंतज़ार नहीं रहता
किसी दुआ, किसी नेकनीयती
के क़ुबूल हो जाने की आस नहीं रहती
ख़ुद को क़िस्मत के हाथों छोड़ देने
की वह सुनी-सुनाई आस्था भी
अंततः
ख़त्म हो ही जाती है।
यूँ ही क्षण के दिनों और दिनों के सालों
में बीतते जाने से
एक पूरा जीवन
आँखों के सामने गुज़र जाता है
और अपनी उपेक्षा और
हार ज़िंदगी के
बड़े मसलों के सामने
बड़ा बेतुका-सा लगने लगती है।
एक भावना जिसे प्रेम कहते हैं
वह थोपा तो
नहीं जा सकता
एक स्थिति जिसे सम्मान कहते हैं
वह ज़बरन तो
नहीं हो सकता।
यह आत्मस्वीकार ही शेष रह जाता है।
बस यह ही
जीवन की कोमल संवेदनाओं का कुल
हासिल रह जाता है।






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