ढूंढ लेना…..

मिल जाना मुझे

हर बार

यूं ही

अनगिनत जन्मों के चक्र में

जीवन मृत्यु के सीमांतों से निकल

व्यक्तियों की भीड़ में

यूं ही टकरा जाना

फिर से एक बार

हर बार।  

इसी एक आश्वासन पर तुमसे विदा लेती रही हूँ

कि चाहे कुछ भी हो जाए

दुनिया कितनी भी विस्तृत क्यूँ न हो जाए

तुम्हें ढूंढ लूँगी।  

कुछ समय पर भी भरोसा है

और थोड़ा हमारी नियतियाँ लिखने वाली

उस अरूप अनाम प्रकृति पर भी

जो किसी न किसी बहाने से हमें एक दूसरे के

सामने ला खड़ा करेगी।

उस आकस्मिक मिल जाने के पीछे

जन्म-जन्मातरों से चलती आ रही

कोई योजना होगी,

जो विस्मृति के अथाह गर्त से भी

हमारी चेतनाओं को उस ऐन क्षण

जब हमारा सामना होगा

एकाएक सजग कर देगी,

उस एक अदद क्षण में मुझे ढूंढ लेना।  

वह क्षण जब जन्मों की खोज

एक दृष्टि पर आकर समाप्त

हो जाएगी यों कि

जैसा हर बार होता आया हो, उस

क्षण पर असीम

आस्था है मुझे और

इसीलिए हर बार तुमसे बिछड़ जाती हूँ

उसी निश्चिंत विश्वास के साथ

कि ढूंढ लेंगे हम अपनी आत्माओं के

अधूरे हिस्सों को।

हर बार उसी रूप में मिलें

यह कोई ज़रूरी भी नहीं,

समय की एक अबाध नदी जो न जाने किस दिगंत से निकल

कब से बहती आ रही है,

उसमें डुबकियाँ लगाते हुए

देह बदल जाया करेगी

पर, उसमें सांस लेती आत्मा

वही होगी

जो तुम्हारी आत्मा को किसी भी रूप

किसी भी काया में

दूर से ही पहचान लेगी।

बस उस क्षण तक की प्रतीक्षा करना

और मुझे मिल जाना

सहसा, अचानक,

सभ्यताओं के रेले में

अब तक जिए गए जीवन के कोलाहल में

किसी शांत निश्चल दुपहर में या

उम्रों की ढलानों पर

और ढूंढ लेना मुझे।  

Leave a comment

Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

Let’s connect

Design a site like this with WordPress.com
Get started