कहानी…

कहानी…

कैसे कहूँ कि मुझे भी तुम्हारी तरह 

अच्छा लगता है चर्चाओं पर चर्चा करना,

लोगों में घिरे रह कर 

बौद्धिक बातें करना।  

दुनियाँ की दिन-ब-दिन जर्जर होती हालत 

पर तरस खाना और 

कभी-कभी एकदम ही उबल पड़ना 

अपने आस पास की ग़रीबी पर, 

असमानता पर, 

तो कभी देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता।  

चाहती हूँ मेरे

हाथों में भी बेलन की जगह कलम हो 

तो लिख कर ही पर अपने दिल की भड़ास निकाल लूँ

और न कुछ सही तो एक सपना ही देख लूँ ।

पर मेरी चिन्ताएँ इतनी मामूली हैं 

इतनी…..घरेलू 

कि मुझे भी यक़ीन नहीं होता कि 

चूल्हे पर चढ़ा दूध पलक झपकते न गिर जाए 

इसकी चिंता अधिक है न कि 

अख़बार की इस ख़बर पर 

कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ख़त्म हो रही है। 

मुझ पर रोटी गोल बेल लेने का तनाव अधिक तारी है 

न कि चुनावों में होने वाली धांधली का ।

मुझे भी इच्छा है कि और न कुछ तो 

कोई कहानी ही लिख डालूँ ,

जिस पर लोग चर्चा करें 

और मुझे मेरी राय ज़ाहिर करने सभाओं में बुलाया जाए 

कि आख़िर मेरी

कहानी के पात्र इतने आजिज़ क्यों हैं?

पर मुझे तो पंखे पर जमी धूल हर वक्त 

यूँ दिखती है कि कोई कहानी 

सूझती ही नहीं। 

पात्र कैसे गढ़ूँ, नाटकीयता भरूँ यह

आता ही नहीं,

विचारों में डूबे रहने का वक़्त ही नहीं।

मुझसे उम्मीद अब लोगों को नहीं बल्कि

खुद मुझे भी होने लगी है कि 

दिन से रात मैं घर को घर बनाती रहूँ।

ऐसे में मेरी सोच काफ़्का और मार्क्स तक कैसे जाए ?

क्योंकि ऐसा तो नहीं कि मुझे ये पसंद नहीं हैं 

पर खुद ही इन्हें अपनी 

अलमारी के अंदर डाल कर 

भारी ताला डाल दिया है ,

ताकि भूले से भी इन पर नज़र न जाए 

और मेरा घर,

घर बना रहे।

इसीलिए जब तुम्हें यूँ नामचीनों में

घिरे एक आदर्श समाज की ज़ुबानी स्थापना में मग्न देखती हूँ

तो मुझे मेरी वास्तविकताएँ

ज़हर लगने लगती हैं और

तुम पर, तुम्हारी इस बौद्धिकता पर 

मन करता है अपनी सारी गृहस्थी झोंक दूँ 

और शायद तब ही कोई सच्ची 

कहानी लिखने बैठूँ। 

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