
छतों की कतार से दिखने वाले दूर क्षितिज पर
तो कभी किसी सूनी खिड़की से झांक जाने वाले मुट्ठी भर आकाश में ,
तंग गलियों में सर उठाए पेड़ों की झुरमुट में
तो कभी खुले चौक पर बने चबूतरे से
दिख जाया करता है वो।
कभी दुधमुंहे बच्चों की गीली आँखों में
तो कभी नौजवान दिलों की उफनती आहों में,
चौकी के पाये से सर टिकाये बूढ़ी तसबीहों में
तो रंगीन चूड़ियों से खनकती कलाइयों में,
अपनी आहटें भर जाता है वो।
कभी गरीबों की सीलन भरी दीवारें
तो कभी अमीरों की मीनारों-सी मुँडेरों पर ,
हों चाहे कमनसीबों के भी वो बेनूर आँगन
या महफ़िल से ख़ुशनसीबों की उड़ती हुई रौनक,
चाँदनी को अपनी मल जाता है वो।
पर तमाम हसरतों और बेसब्र निगाहों को
आकाश तलाशती असंख्य नज़रों को,
इबादत में भरपूर झुके सरों को,
साथ खुशियाँ मनाने और ईद मुबारक
कहने का मौका, दे जाता है वो,
हाँ, वो ईद का चाँद।






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