
सूर्य के आकर्षण में फंसी
पृथ्वी की तरह नहीं, जो बस उसकी तय
की हुई परिधि पर घूमती रहे
आदि से अंत तक, अनवरत, प्रश्नहीन।
समंदर की अतल गहराइयों में वास करने वाली
मछली की तरह भी नहीं
जिसका सम्पूर्ण अस्तित्व जलमग्न हो
और जल से बाहर निकलने की न हो कोई गुंजाइश।
कुछ-कुछ उन वृक्षों से लगी
असंख्य पत्तियों की तरह भी नहीं
जिनका टहनियों के आश्रय के अलावा कोई ठोस आधार नहीं
और डार से बिछड़ जो भटकने के लिए हों चिरशापित।
हमारा प्रेम हो…
संभवतः ब्रह्मांड में छिटके अनंत नक्षत्रों की तरह जो
भले ही काल के प्रवाह में एक-दूसरे से
दूर होते रहें, पर गुरुत्वाकर्षण की डोर उन्हें एक-दूसरे
से बांधे रहे।
एक अनुशासित स्वच्छंदता जिसमें
दोनों अपने स्वरूप को नित
नयेपन से गढ़ते रहें , नयी आकाशगंगाएँ रचते रहें।
शायद समंदर में प्रतिपल
उठने वाली लहरों की तरह
जो जल के साथ प्रेम में निमग्न होकर
भी अपना अलग अस्तित्व रखती हैं, विनाश भी ला सकती हैं और
निर्माण भी करती हैं।
हमारा प्रेम हम दोनों ही को मुक्त करे,
लगभग वैसे जैसे पक्षी
के सामने अवसर है उड़ान भरने को गगन के
अनंत विस्तार में और
अपने नीड़ में लौटने का विकल्प भी बिना
इस भय के कि वृक्ष उससे आधार छीन लेगा।
हमारा प्रेम एक दूसरे को सुख देने के वचन के साथ न आए
क्योंकि सुख तो हमारी निजी ज़िम्मेदारी है।
हाँ तुम मुझे और मैं तुम्हें मुक्त कर सकूँ
हमारे व्यक्तित्व की
सीमाओं से , लघुताओं से, सोच की संकीर्णताओं से,
यह आधार बेहद ज़रूरी है।
तुम मुझे और मैं तुम्हें वर्तमान से बेहतर कर सकूँ,
जो है उससे दुगुना कर सकूँ
अनुपस्थित होकर भी प्रेरित कर सकूँ और करूँ
आत्मा को उद्दात ,
प्रेम हमारा हो तो ऐसा हो।
और तभी वस्तुतः उसकी सार्थकता है
वरना प्रेम जैसी विरल वस्तु सबके लिए सुलभ न हो जाएगी ?






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