
शाम की लालिमा लिए नीले आकाश में,
कुछ पतंगें उड़ा करती थीं।
ऊँचा थोड़ा और, थोड़ा और,
वो डोर को ज़रा सा ढील दे कर
हवा में थोड़ा और सरकती हुई पतंगें,
हवा से मानो कोई होड़ किया करती थीं।
अपनी खिड़की से उस खुली छत पर
दुपहर ढलते ही जमा हुए बचपन को
वो बड़ी हसरत से देखा करती।
सुबह ही से वह उत्सुक प्रतीक्षा उसकी
कि कब शाम ढले और वो
देख पाए उसे जो उस भीड़ में
भी रह रह कर उसकी खिड़की की तरफ़
छुपी नज़रों से देख लेता था।
डोर थामे हाथों को अंदाज़ा बख़ूबी था कि
खिड़की से लगी वह दो नन्हीं आँखें
उस भीड़ में उसे ही ढूंढा करती हैं।
बचपन की उस मासूम आँखमिचोली
में पतंगें खेला करती थीं अपना ही खेल
ऊँचा उड़ाता उसे जब वह छत पर से
उसकी गुज़ारता तो बन जाती थी
पतंगें अनकही चिट्ठी उस अमूक प्रेम की
और मचलते हुए अपनी छत पर आ जब वह बेबात
झूमती तो मानो मिल जाता
उस लिखने वाले को अपना जवाब।
जाने कब पतंगे समय के बहाव में
उड़ती हुई उन बच्चों को बड़ा कर गई।
वह कभी आबाद रही बस्ती अब
उनके बड़े होने पर जाने क्यों उजाड़ हो गई?
सपनों की पतंगें उड़ाने के लिए
उन्हें अपने आशियानों से छूट कर
बचपन की पकड़ से परे हो जाना पड़ा।
वक़्त के बदलावों के आगे कहीं
दूर भटक जाना पड़ा।
पर सालों बाद भी किसी गहरी रात
में जब वह कोई सपना देखते
तो धुँधलायी ही सही पर
नज़र आ जाती वही खिड़की और उससे होकर
मिलने वाली वह दो जोड़ी आँखें।
और भोर तक वह सपना लगातार चलता।
पतंगे लाल पीली नीली हवा में
लहराती आसमान से बातें करती हुई
उसके छत पर यूं मचल कर आ जाने
का अब भी इंतज़ार करती हैं।
हालांकि उनके बचपन और इस सपने तक
में एक लंबा वक़्फ़ा बीत गया है।
पर बचपन के उस मासूम प्रेम की अकथ कहानी
धरती और आसमान के प्रेम का वह गहरा फ़साना
पतंगें हवा में झूमते हुए आज भी
बादलों को सुना रही हैं।
जिस शहर जिस भी आकाश तले वो रहें
हवा में उड़ती पतंगें जब उसकी आँखों
से गुज़रेंगी मानो उसने भेज दी होगी पाती
और यूं उन्हें नज़र भर देख लेने से ही
दे दिया होगा उसने अपना जवाब।
सपनों में ही पर उनके बचपन का शहर एक बार
फिर हो आया करेगा आबाद।
सपनों में ही सही पर वह प्रेम शाश्वत है।
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