हम ख़ामोश लोग,

चुपचाप लोग,

जिनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता

या शायद कहने को बहुत कुछ

बस उन्हें ध्वनियों की शक्ल में बाहर

निकालने का जज़्बा नहीं होता,

उन्हें प्रायः कमतर मान लिया जाता है

बेज़ुबान अदना करार दिया जाता है।

वो जिन्हें नहीं आता अपनी कामयाबियों

को सचमुच कोई बड़ी शै समझना,

या नहीं आता अपने किए का ढोल पीटना,

जो नहीं लेते किसी भी जुलूस में हिस्सा

और नहीं करते ज़ाहिर अपनी राय

बरपा कर कोई हंगामा,

उन्हें क़तार से बिलकुल ही

बाहर निकाल दिया जाता है

समझ कर साधारण या अस्तित्वहीन।

यह शायद लोग समझ नहीं पाते कि

चुप लगा कर भी बड़े कारनामे

दिये जा सकते हैं अंजाम, बिना

किसी ताली के लोभ से।

कि बिना चीखे चिल्लाए भी गिराये जा सकते हैं तख़्त,

ढहाये जा सकते हैं मठ

रखी जा सकती है अपनी बात

बचाये जा सकते हैं अपने उसूल।

ज़रूरी नहीं कि समूह में हो रही चर्चा

में जो व्यक्ति शांत सबकी सुनता हो

उसके पास विचारों का कोई अभाव है

या उसे बस सहमति देनी आती हो

क्योंकि बहुत संभव है कि वह

सुर में सुर मिलाना ज़रूरी न

समझता हो , और उसका

मौन ही उसका सबसे बड़ा विरोध हो।

जो शायद न कही जाने वाली बातों

को भी अपने लेखनी में कह जाता हो

जिसकी गूंज ज़माने तक भले देर से,

पर पहुँचती ज़रूर है।

इतिहास गवाह है।

रहा है वह साक्षी, उस समय का

जब ख़ामोश रहने वालों ने भी इतिहास

को मोड़ा है

युगों की दिशा निर्धारित की है

ग्रहों की दशाएँ फेरी हैं

समाज की रवायतें बदली हैं

हाशिये को भी अभिव्यक्ति दी है

मौन में निहित शक्ति से क्रांतियाँ लायी हैं।

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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