
तुम्हें संभाल रखा है मैंने कहीं
गहरे भीतर अपने।
पहुंचाती हूँ वहाँ बस, चाँद की दूधिया
रोशनी, सुबह घास से उठा कर लाए
टटके हरसिंगार की पावन
गंध ,नन्हें सूरज की उजली किरणें
और पत्तों पर से सरसरा कर गिर जाने
वाली ओस की बूंदें।
बचाना चाहती हूँ तुम्हें हर उस अनुभव से
जो मेरे लिए आम है।
सड़क पार करते हुए गाड़ियों से कुचले
जाने का डर, सब कुछ खुद ही निबटा कर
वक्त पर कहीं पहुँचने
की हड़बड़ी, अनजान चेहरों से रोज जूझने
का क्रम , चलती हुई बसों से उतरने की
कसरत, लोगों की घूरती
निगाहें, हर वक़्त की एहसास-ए- कमतरी,
आकाश में शाम के गहराने से कहीं
पहले, अपने ठिकाने पर पहुँच जाने की मजबूरी।
दरअसल वह सब कुछ, जो मेरे
बाह्य संसार का ,
मेरे स्त्री होने का हिस्सा है।
और जिन सब से गुज़रना मुझे नागवार लगता है।
इसीलिए तुम्हें इन अनुभवों की भनक भी
नहीं लगने देना चाहती।
नहीं चाहती जो तुम्हें एक लड़की होकर
जीने की नियति का
पता चल जाए, तो कहीं तुम मेरे भीतर से
आने से ही इनकार कर दो।
इसीलिए, नींद आ जाए तुम्हें
सुनाती रहती हूँ चाँद की, परियों की, फरिश्तों
की कहानियाँ, हमारे इंसानी समाज में
समानता की निशानियाँ।
जानती हूँ कि
आँख खुलते ही तुम्हें अपने अनुभव खुद
ही महसूसने होंगे, इसीलिए तब तक मैं करना चाहती
हूँ तुम्हारी रक्षा , उन
अनुभवों की सोच से।
कहीं भीतर तुम्हें सहेज कर
रखना चाहती हूँ, और बस तुम तक पहुंचाना
चाहती हूँ,
दूधिया रोशनी, हरसिंगार, ओस, सूर्य की नन्हीं किरणें ।






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