
ढलती हुई शाम , आती हुई रात से
घुलती हुई चलाती है , कुछ
छूटता , कुछ फिसलता-सा एक सिलसिला।
अँधेरों में धीरे-धीरे घिरता आकाश,
मानो चल रहा हो
गहरा , बोझिल , सन्न-सा वार्तालाप।
पक्षियों की पांतें बसेरों की ओर लौटती,
किसी मज़ार पर जलते हुए
लोबान से महकती हुई गलियां, दूर
किसी नीम तले बने मंदिर से आती, भारी
घंटियों की अनवरत आवाज़।
अधखुली खिड़कियों से रह-रह कर निकल जाता
किसी सालन का धुआँ ।
तंग आँगन में खेलती मचलती नन्हीं किलकारियाँ
बाहर चबूतरे पर बैठे बूढ़े की
वह बेदम खाँसियाँ, रात
इन सबको अपने अंक में
सहेजने को तैयार बैठी है।
मानो विकल्पहीन शाम को वह दे रही हो, भरोसा
कि अभी कोई दिन-भर का थका-हारा हुआ
चुपचाप सो रहेगा।
कि घिरनी की तरह नाचती हुई वह स्त्री
अब थोड़ा कर सकेगी आराम, दीवार
से लगा वह मद्धिम रोशनी
देता हुआ पुराना बल्ब, बुझा
दिया जाएगा।
उसपर नाचने वाले पतंगे भी
थक कर सो जाएंगे।
और कुछ यूं रात गहराती जाती है कि
बस आकाश में छिटके हुए तारे ही जागेंगे
चोर सुबह को
दबे पाँव आते देखने को, और
कुछ आवारा कुत्तों की आती आवाज़
ही बचेंगे आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र।






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