
तुझे कितना जाना है हमने ज़िंदगी।
समय की छलनी से चाले
हुए लम्हों की कड़ियाँ-ही-कड़ियाँ।
वो मिलना बिछड़ना
वो गिरना संभलना।
वो सावन की बारिश में
घुलना पिघलना
वो जेठ की दुपहरी
में तपना मचलना ।
वो पतझड़ की शामों
की पीली उदासी।
ठिठुरते हुए रातों की
वो लंबी उबासीं।
हर मौसम, हर रंग में तुझे
ख़ुद में सिमटते हुए देखा है ज़िंदगी।
समय ने सिखाये हैं एहसास कितने
कई चुप्पियाँ भी, तो
वहीं कितनी ज़ुबानें।
कभी रिश्तों की उलझन
तो कभी इनकी भी सुलझन।
एक लंबी सुरंग-सी चलती ही रहती,
सुरंगों में जाना, जाकर ठहरना
अंधेरों से लड़ना।
कभी खाते हुए ठोकर
कभी ज़ख़्मी-से हो कर।
तो कभी बचते संभलते
यूँ ही चुपचाप
सुरंगों से बाहर निकलना।
इन्हीं रिश्तों के सुरंगों से
तुझे दो-चार होते हुए पाया है ज़िंदगी।
हैं कितने ही चेहरे
हैं कितनी ही यादें
यहाँ मुश्किल हैं सालों के
किरचें सजाने।
सवालों जवाबों से छाये
हुए दिन हैं,
ख़्वाबों ख़यालों से
भारी हैं रातें ।
कोई सपना अधूरा कई
जवाबें मुक़म्मल।
कई ख़याल हवाई
कुछ सवाल बेमानी।
इन्हीं सपनों, उन्हीं चेहरों से
तुझे ज़ार-ज़ार टकराते देखा है ज़िंदगी।
कभी तुमसे हैं लेते
कभी भर-भर के पाते।
हम इंसा भी क़र्ज़ों को हैं
कैसे-कैसे चुकाते।
जो तुझसे है मिलता
वो अनचाहा-सा तोहफ़ा
ज़रूरत पर उसके ताउम्र रोते।
कभी वो सब भी पाते
जो ना देखा न भाला।
हैं ऊम्रें गुज़रती इन
सौदों की तह तक उतरते।
फिर भी है शिद्दत
तुझे पाने की सबको
भले ही गिलाओं की फ़ेहरिस्त लंबी।
तुझे सच में है जाना
बड़ी हसरत से ज़िंदगी।






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