प्रतीक्षा….

अब जबकि मुझे यक़ीन हो चला है

कि वो जो तुमने कुछ अरसा पहले कहा था

वह आखिरी हर्फ़ था हमारे बीच।

जाने क्यूँ दिल को सुकून-सा आ गया है।

यह इत्मीनान हो चला है कि

अब न गुज़रेंगी इंतज़ार में घड़ियाँ

न होगी प्रतीक्षा उस समय की

जिसका दिल को लगा होता था खटका।

कि क्या जाने, आज, शायद, आज तो

आ जाए तुम्हारा ख़त।

फिर छिड़ जाए कोई नई बात

कुछ नया सिलसिला।

फिर भूल कर खुद को, मन

खो जाए ख़तों के जवाब लिखने में।

रुकना हर एक लफ़्ज़ पर, पढ़ना कुछ अपनी और तुम्हारी निगाहों से।

अपने हर लिखे को कई-कई अर्थों से भरना

कि शायद तुम तक पहुँच जाए शब्दों के ही मार्फत

पर, मेरा हर एक मायना।

सवालों-जवाबों में घिर-घिर कर

यूं चलाते रहना एक लंबा सिलसिला।

करना थोड़ी प्रतीक्षा , करवाना तुम्हें भी थोड़ा इंतज़ार।

हमारे शब्दों से निर्मित होता वह अद्भुत संसार।

इस पूरे निर्माण से ही मुझे मानो

अब मिल गई है फ़ुरसत ।

कि जवाब न देने के तुम्हारे इख़्तियार

ने सवालों के मेरे सिलसिलों

की थाम ली है रफ़्तार।

और सच मानो तो मन अब है पुरसुकूँ

नहीं करनी उसे अब जवाबों की तैयारी।

मान लिया है उसने कि

हर प्रश्न के उत्तर मिल ही जाएँ, कोई ज़रुरी नहीं।

जाना है उसने कि

ज़िंदगी की तरह ही शायद

बातों का कोई सिरा नहीं होता।

समझ में बड़ी देर से पर, आया

कि शुरू की गई बातों

का, कोई सुंदर अंत भी हो यह ज़रुरी नहीं होता।

सुंदर अंत के निर्माण की ज़िम्मेदारी स्वयं

विधाता ने भी कहाँ ली है।

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

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तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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