तुम…

तुम…

मेरी तन्हाइयों में जो गूँजता है हर पल,

वो कोई अधूरा-सा राग हो तुम।

मेरी ख़ामोश आँखें जो पढ़ती हैं पल-पल,

एक वो कोरा-सा किताब हो तुम।।

हवाओं ने आकर शिकायत-सी की है,

तुम्हें ढूंढ लाऊं ये मिन्नत भी की है,

नदी, रेत, पर्वत, समंदर, घटाएँ,

कहाँ-से-कहाँ तक मैं फेरूँ निगाहें,

मुझे तुम से अलगाने को ही शायद, सारी फ़िज़ा ने बग़ावत-सी की है।

तुम्हें ख़ुद में पाऊँ, तो अनोखा-सा क्या है ?

मेरी साँसों में हो तुम, क्या कुछ इसमें नया है ?

मैं तुम हूँ, तुम में ही हूँ मैं,

दो जिस्मों की अब रूह को, ज़रूरत ही क्या है ?

उफनती , धड़कती, सुलगती, सिसकती,

मोहब्बत में दिलों की, ये हालत-सी क्या है ?

मिले तुम से फ़ुरसत तो कुछ चैन पाएँ ,

सिलवट-सी यादों के हिसाब हम भी लगाएँ,

कि क्या सब है पाया , है क्या-क्या गंवाया?

कुछ मुझ पर है बांकी, कुछ तुम पर बक़ाया।

चलो सिलसिला ये अपना कई जन्मों चलाएं।।

मेरी तन्हाइयों में जो गूँजता है हर पल,

वो कोई अधूरा-सा, राग हो तुम।

मेरी ख़ामोश आँखें जो पढ़ती हैं पल-पल,

एक वो कोरा-सा, किताब हो तुम।।

2 responses to “तुम…”

  1. poetry – ज़िन्दगीनामा avatar

    […] Aug 4, 2023 तुम… […]

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  2. SupriyoWrites avatar
    SupriyoWrites

    खुबसूरत

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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