
मेरी तन्हाइयों में जो गूँजता है हर पल,
वो कोई अधूरा-सा राग हो तुम।
मेरी ख़ामोश आँखें जो पढ़ती हैं पल-पल,
एक वो कोरा-सा किताब हो तुम।।
हवाओं ने आकर शिकायत-सी की है,
तुम्हें ढूंढ लाऊं ये मिन्नत भी की है,
नदी, रेत, पर्वत, समंदर, घटाएँ,
कहाँ-से-कहाँ तक मैं फेरूँ निगाहें,
मुझे तुम से अलगाने को ही शायद, सारी फ़िज़ा ने बग़ावत-सी की है।
तुम्हें ख़ुद में पाऊँ, तो अनोखा-सा क्या है ?
मेरी साँसों में हो तुम, क्या कुछ इसमें नया है ?
मैं तुम हूँ, तुम में ही हूँ मैं,
दो जिस्मों की अब रूह को, ज़रूरत ही क्या है ?
उफनती , धड़कती, सुलगती, सिसकती,
मोहब्बत में दिलों की, ये हालत-सी क्या है ?
मिले तुम से फ़ुरसत तो कुछ चैन पाएँ ,
सिलवट-सी यादों के हिसाब हम भी लगाएँ,
कि क्या सब है पाया , है क्या-क्या गंवाया?
कुछ मुझ पर है बांकी, कुछ तुम पर बक़ाया।
चलो सिलसिला ये अपना कई जन्मों चलाएं।।
मेरी तन्हाइयों में जो गूँजता है हर पल,
वो कोई अधूरा-सा, राग हो तुम।
मेरी ख़ामोश आँखें जो पढ़ती हैं पल-पल,
एक वो कोरा-सा, किताब हो तुम।।






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