चाँद से बातें……

घने बादलों के भीतर यूं घटते-बढ़ते 

लुक छिप चलते 

मुझको ढूंढ लेते हो तुम 

चाँद मेरे मन के आकाश में हर रोज़ निकलते हो तुम। 

तुम्हें करनी होती हैं मुझसे कितनी बातें 

दिन-भर के हाल 

देश-दुनियाँ बेहाल  

मौन रह कर तुम केवल संकेतों से करते सवाल। 

मुझे भी तो रहते हैं अनगिनत काम 

कुछ अधूरी क़िताब

कोई अधलिखी-सी पंक्ति 

शाम तक निबट कर भी क्षीण होती मेरी शक्ति। 

तुम भी तो कुछ कहो अपनी बात 

बादलों का कोई क़िस्सा 

तारों की कोई रवायत  

और कुछ न सही तो उस मुंहजले सूरज की ही कोई शिकायत। 

सुनाओ मुझे भी वो पहाड़ा आसमानी 

कुछ पुराना तिलिस्म  

कोई आदम कहानी 

वो चरखे वाली बुढ़िया के सूते से भरभराती चाँदनी। 

ज़मीं पर के दुखड़े तुम्हें क्या बताऊँ

वही मुफ़लिसी है 

वही सर्द आहें 

सिसकते दिलों की न ले कोई बलाएँ। 

वो लाचार थोड़ी अपाहिज-सी बुढ़िया

दानों को तरसते 

वो नादान बच्चे 

चिमनियों में जलते,गलियों में बिकते, वो इंसान सच्चे।

कहाँ तक चुराऊँ मैं इनसे निगाहें 

दिखते ही रहते 

सुनाई ही देते 

हर शहर गाँव कूचे ये इंसा तड़पते। 

सुनाऊँ भला कैसे केवल मैं अपनी-ही-अपनी 

सुनों आज सबकी 

की सुननी पड़ेगी

मेरी धरती के मज़लूमों की अनथक कहानी।  

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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