राग मल्हार

बरसात की रातों की होती है अपनी

नीरवता,

एक अंतर्निहित राग,

अपना निजी संगीत।

झमाझम बरसते मेघ के सुर में,

घुलती हुई प्रकृति।

शाम पड़े झींगुरों की लगातार बजती

बाँसुरी, बरसाती पानी से लबलबाये गड्ढों,

से बजती मोटे-मोटे मेढकों

की डफली, बूंदों की टप-टप जो कभी

झीसी की आवाज़ में

छनती, तो कभी

धुआंधार खट-खट-खट-सी गिरती।

इन सबके साथ

सम पर ताल देती ठंडी

नमीदार हवा, जो हूहूवाते हुए, बूंदों को

इधर से उधर झकझोरती-

फटकारती चलती है।

और इन्हीं से थपेड़े खा,

झुक-झुक कर धरती से जा लगते

हरे-कचूर पेड़ और उनकी सहमी-सहमी पत्तियां।

चौड़े पाल्म के पत्तों पर टपटपाती

बूंदें, पत्तियों को चीर कर निकलने की

होड़ में, नि:सृत करतीं एक अलग ही आवाज़

मानो सूती के कपड़े चड़ से फटे हों

चड़-चड़-चड़ाक।

सब आवाज़ें मेघों से लदे

बरसात की नीरव रात को

बना देती हैं

संगीतमय और

बन जाता है प्रकृति का अपना ही कोई,

राग मल्हार।

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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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