
बोझिल और मद्धिम हवा, कुछ थकी-सी अलसाई,
खिड़की की काँच से दिखती ,
पत्तियों से छन-छन कर गिरती कतरा-कतरा धूप ।
मन भी अबूझ ख्यालों में डूबा, तिरता,
देखता पारदर्शी काँच के आर- पार
पत्तियों के बीच से फिर- फिर झांक जाती धूप
धीरे- धीरे मानो भरती मन के आँगन में ।
सुबह और दिन के ठीक बीच का समय
पेड़ों के मजबूत तने खिलते- करते शाम का इंतज़ार,
कुछ-कुछ उनींदी और बोझिल मन की गति
विचारों का क्षणिक रुकता, उठता और गिरता प्रवाह ।
और फिर यूं चुपचाप, दबे पाँव से आती है दुपहरी,
साँय-साँय करते सन्नाटे की चादर,
नीरव गहन चुप्पी में डूबता मन, पर
यह क्या, किसने दे मारा कंकड़ इस थिर पानी पर,
और चौंक उठता हो इधर चोर मन ।
आँख खुली तो पाया समेट रही है धूप अपना घर,
कुछ तिरछी, कुछ आड़ी रेखाओं पर थोड़ा ठहर ,
एक पीली उदासी फैलती जाती हो मन पर ,
सामने झुंड पक्षियों की बेतहाशा गूँजती चहचहाहट,
और पत्तियों से छन, फिर- फिर रिसती धूप ।







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