
उलझनें तमाम उम्र की बस
उस एक पल में सुलझती लगती हैं,
जब महज़ ख्याल तुम्हारा वजूद में आता है।
हाँ , गुज़रे हैं बरस कई, चंद लम्हों के इंतज़ार में
बीत गए हैं क्षण अनगिनत,
एक तुम्हारे खुमार में।
पर ऐसा गुमान होता है मानो बरसों
और क्षणों ने कुछ गहराया ही है इस इंतज़ार को,
और लहकाया है इन आँखों की बयार को।
कहते हैं समय से बड़ा मरहम दीगर नहीं होता
पर दूर कहीं तुमसे , इसने ही तो
दुख को मेरे,और, थोड़ा और, सुलगाया है।
और, अब जब कि आहटें उन कदमों की
अपनी तरफ आता पाती हूँ तो सच जानो
समय की उस रेत को मुट्ठियों में कसने को जी चाहता है।
ताकि तुम्हारे न होने के क्षणों में
बनाई गयी तुम्हारी छवियाँ चेतना से छूट न जाएँ
और आँखों की वो तपिश
और वो खुमार
तुम्हें सामने पा कर खत्म न हो जाएँ ।
मिलाया है मैंने तुममें अपना
सबसे पसंदीदा रंग
कहीं दूर नदी किनारे, हाथों में
उठा कर लायी है गहरी चिकनी मिट्टी
क्षण -क्षण, युग-युग गढ़ती रही हूँ
तुम्हारी प्रतिमा
जो मुझे ईश्वर की बनायी इस
दुनियाँ से भी प्रिय है।
मैंने दिए हैं तुम्हें नाम, रूप, आकार
अपने से मिलता -जुलता नहीं
वह सब कुछ जो शायद मैं नहीं
मेरी भावनाओं का मूर्त स्वरूप
कोमल कल्पनाओं का बहुत सुंदर नहीं
केवल सुंदर रूप ।
करती आई हूँ तुमसे संवाद
न केवल अपने एकांत में पर
निविड़ कोलाहल के भी बीच
जानती हूँ तुम्हारे सभी जवाब , वो
भवों की सिकुड़न ,
मेरी किसी मासूम बात पर ।
तुम्हारे चेहरे की रेखाओं से रचती रही हूँ
मैं अपने अगले संवाद ।
डरती हूँ कि तुम्हें सहसा सामने पाकर
मैं न करने लगूँ , तुम्हारा मिलान
अपनी कलाकृति के साथ
और एक भी रंग और कोई भी
आड़ी रेखा तुमसे भिन्न होने पर
मुझे अपना निर्माण लगने लगे व्यर्थ ।
मेरी कल्पनाएँ सब
कितनी असमर्थ !
उस एक क्षण के प्रलय के बाद
क्या हम रच सकेंगे फिर से संसार ?







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