“नौकरी हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है”

नौकरी की तलाश कब ज़िंदगी का इतना ज़रूरी हिस्सा बन जाता है, पता ही नहीं चलता। जाने क्या सोच कर सुबह घर से निकल आयी। लगा कहीं ना कहीं ,कभी न कभी तो शुरुआत करनी होगी। कभी तो मुझे भी इन तमाम अनजान चेहरों के बीच उसी तत्परता के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ेगा। आख़िर कब तक किसी शुभ घड़ी का इंतज़ार किया जाये।

कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज़, दक्षिणी दिल्ली में शेखसराय नाम की जगह पर बड़े से परिसर में फैला एक कॉलेज।बड़ी विडम्बना की ही बात है, वोकेशन मुहैया कराने वाले कॉलेज में भी हिंदी साहित्य को पढ़ाया जा रहा है, जिसके विद्यार्थी को वोकेशन के लिए बड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है। सुबह 10 बजे से साक्षात्कार थे। पहुँचने पर कई जगहों पर साइन करना था। एक बड़े से कमरे में अनगिनत चेहरे एक रजिस्टर पर अपना-अपना नाम और केटेगरी दर्ज कर रहे थे। मैं जब सामने चली गई तो पीछे से आवाज़ आयी “हेलो मैडम लाइन लगी है , आप पीछे से आ कर लगो”। मैं हाथ में बैग थामे भीड़ के पीछे खड़ी हो गई । नाम दर्ज करना ज़रूरी था तभी “साक्षात्कार” के लिए बुलाएँगे।

सोचती हूँ , जब कहीं-न-कहीं सबको पता है कि जिस किसी की कोई पहुँच है, इंटरव्यू पैनल के सदस्यों को अपने किसी -न-किसी परिचित से फ़ोन करवाया गया होगा, तो फिर लोग इन इंटरव्यूज़ में आ क्यूँ जाते हैं? मतलब उम्मीद पर दुनियाँ क़ायम है, ये बात बस कहने भर की नहीं है, बल्कि हिंदी साहित्य के विद्यार्थी इस पर भरोसा भी करते हैं, वरना इतनी भारी संख्या में अपनी उपस्थिति क्यूँ दर्ज करवाते? सोचती हूँ, क्या सब-के-सब अपना जुगाड़ लगा कर आते हैं , या शायद मन में अब भी एक उम्मीद बची होती हो कि आज उनकी क़िस्मत ही साथ दे दे। जिस किसी से भी थोड़ी-बहुत बात हुई उससे ये ज़रूर पता लगा कि हर धर्म के अनुयायियों की तरह ही इंटरव्यू देने आने वाले विद्यार्थियों की भी अपनी-अपनी मान्यताएँ, अपने-अपने भ्रम थे।मसलन, जो कहीं कोई दिल्ली की बाहर की यूनिवर्सिटी का पढ़ा हुआ हो तो वह मान कर ही चल रहा होता है कि बस दिल्ली वालों को ही ‘ये लोग’ लेते हैं, उनका तो कोई चांस ही नहीं, वो तो बस तमाशा देखने पहुँच गए हैं।समझ नहीं आता कि अस्पृश्यता के संवैधानिक रूप से ग़ैरक़ानूनी होने के बाद भी कैसे ये तथाकथित ‘ये लोग’ ऐसा भेदभाव कर रहे हैं। मान्यताओं की फ़ेहरिस्त लम्बी थी।

बहरहाल, यहाँ भाँति-भाँति के चेहरे हैं। हर ऐज ग्रुप के । कइयों को देख के भ्रम हुआ कि शायद ये साक्षात्कार लेने आये हैं। उम्र के कई बसंत पार कर चुके न जाने कितने अनुभवी चेहरे हैं जो ऐसे ऐसे इंटरव्यू के चिर-परिचित चेहरे हैं। एक-दूसरे को पहचानते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कोई शराबख़ाने जाने वाला अपने नित्य के साथियों को पहचानता हो । वाक़ई इंटरव्यू देना किसी नशे से कम है क्या। क़िस्मत को आज़माने का नशा, अपनी-अपनी जुगाड़ों को परखने का नशा, उस एक अनजान पल के इंतज़ार का नशा, जहां 4-5 मूर्द्धन्य शिक्षकों द्वारा आपकी योग्यता की पूरी कुंडली , संपूर्ण इतिहास को सिर्फ़ 4-5 मिनटों में ही जान लिया जाएगा।

यहाँ भी सब, सबको जानते हैं। शायद अकादमिक दुनिया होती ही इतनी छोटी है कि बार -बार हम उन्हीं चेहरों से टकराते हैं जो कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी साथ थे। यहाँ भी 80 के लगभग लोग जुट ही गये थे। एक अनार और सौ बीमार की कहावत का उदाहरण देखना हो ना तो ऐसे-ऐसे दिनों पर इन कॉलेज के प्रिंसिपल रूम के बाहर देखना चाहिए। साक्षात्कार के लिए परिसरों में अपनी-अपनी बारियों का इंतज़ार करते हुए सब सबके संसाधनों का, एक-दूसरे की सफलता के चांसेज का मन-ही-मन आकलन करते हुए वक़्त गुज़ारा करते हैं ।छोटे-छोटे समूहों में खड़े सब अपने किसी न किसी पुराने साक्षात्कार का अनुभव साझा करते हैं – कितना सच कितना झूठ , कोई काउंटर क्वेश्चन करने वाला नहीं हैं । बस सब , सबकी सुनते हैं, मौक़ा मिला तो अपनी भी सुनाते हैं। एक आध महानुभाव तो बस मानो अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत के लिए इस घड़ी से बेहतर कोई मंच ही नहीं मानते हैं । साक्षात्कार की इंटर्नल पोलिटिक्स की इतनी गहरी पकड़, मतलब, ज़बरदस्त। कॉलेज की नौकरी का तो नहीं पता, मीडिया में राजनीतिक विश्लेषक की नौकरी तो कोई नहीं छीन सकता इनसे। परिसर में हर जगह बातों का शोर। दुनियाँ भर की बात। विवाहित स्त्रियाँ घर परिवार की बातों में यूँ उलझी हुई मानो अगर कोई याद न दिलाए कि वो इंटरव्यू देने आयी हैं, तो बस गप्प मार कर ही घर चली जाएँ। कुछ एक तो मानो बस आयी हीं इसलिए थीं कि पुरानी साथिनों से थोड़ी मुलाक़ात ही हो जाए, नौकरी तो यूँ भी नहीं मिलनी थी। कोई ही इक्का दुक्का, भीड़ से अलग इंटरव्यू की तैयारी में तल्लीन दिखता है, पर ये अक्सर वो थे जो अभी भी साक्षात्कार व्यवस्था पर असीम आस्था रखे हुए थे, या पहली बार आए थे, या जिन्हें यह नहीं बताया गया था कि कुल मिला कर शकल ही देखेंगे तो ज़ेहन पर इतना ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं है।

यहाँ आकर वाक़ई लग रहा है सब इस सर्कस के पुराने जोकर हैं , मैं ताजातरीं दर्शक की तरह सब को प्रश्नवाचक निगाहों से घूर रही हूँ क्योंकि जल्द ही इन जोकरों की जमात में ख़ुद भी शामिल हो जाऊँगी। तब शायद मेरे भी पास क़िस्से होंगे सुनाने को – कि फ़लाँ इंटरव्यू में फ़लाँ एक्सपर्ट आये थे , कि वो वाले इंटरव्यू में सबको बस बुलाया गया था , जिन्हें लेना था वो तो पहले ही से तय था, या कि फ़लाँ कॉलेज में तो इंटरव्यू ही नहीं लिया , कमरे में बस नाम और चेहरा देख कर , “हो गया इंटरव्यू” बोल दिया गया, आदि, इत्यादि।

फ़िलहाल अपनी बारी का इंतज़ार करते-करते जब आस पास खड़े लोगों को देख रही हूँ तो लगता है कि मुझसे कहीं ज़्यादा ज़रूरत किसी-न-किसी नौकरी की इन लोगों को है। कोई शायद घर का एक मात्र कमाने वाला , बाहर निकलने वाला है।ऐसे पुरुष जिन्हें नौकरी न मिली तो क़र्ज़ों में डूबने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा। कई महिलाएँ जो ना जाने कितने सालों से इस अस्थायी शिक्षा की व्यवस्था में सेशन-दर-सेशन इंटरव्यूज़ देने की आदी हो गयीं थीं, उनकी उकताहट के सामने अपने साठवें नम्बर पर होने की खीझ पर केवल हंसी ही आ रही थी। महिलाएँ, सबसे ज़्यादा भुक्तभोगी हैं। एक, जो बड़ी देर बाद आयी, अपनी दोस्त को बतलाते हुए कहा कि सुबह बच्चे को स्कूल और पति को ऑफ़िस भेज कर जब झाड़ू लगा रही थी तब पता चला कि ऐसा कुछ इंटरव्यू होने वाला है। बस झाड़ू फेंक कर कपड़े बदल, मुँह पोंछ कर, पूरे बदहवासी के आलम में भागती हुई चली आयी। उनकी चिंता यहाँ आकर भी इंटरव्यू की नहीं थी, बल्कि यह कि इस औचक साक्षात्कार के लिए वो आ तो गयीं पर बच्चे घर आ कर खाएँगे क्या? और ऐसी दुश्चिंताएँ किसी एक की हो तो कोई बात भी हो। एक दूसरी कुर्सी पर लगभग 50 के आस-पास की एक सुंदर, गरिमामयी महिला महीन पश्मीना ओढ़े हुए, फ़ोन पर अपनी कामवाली को समझा रही थीं कि खाने में किसको दलिया देना है या नहीं। उनका बस नहीं चल रहा था, वरना निर्देश देते हुए इतना झल्ला चुकीं थीं कि मानो फ़ोन फेंका ही चाहती हों। पर वहीं पुरुष बेरोज़गारी की दशा में भी पुरसुकूँ थे। चाय पे चाय पीते, हंसी-ठिठोलियाँ करते, कुछ एक अपने भावी जीवनसाथी की तलाश में इंटरव्यू से ज़्यादा व्याकुल दिखते हुए कनखियों के बजाय आँखें फाड़-फाड़ कर कमसिनों को घूरने में व्यस्त। रहिमन इस संसार में भाँति भाँति के लोग -कवि ने कितना सही कहा था।

पर इन सब के बीच, एक चीज़ जो समझ आती है कि कहीं न कहीं कुछ तो मिसमैच है, कुछ है जो ठीक नहीं है। जितनी कम जगहें विभागों में निकलती हैं उसकी तुलना में इतनी भारी भीड़ देख कर सोचने का मन करता है कि किसे दोष दिया जाये। व्यवस्था को या इस व्यवस्था में बिना प्रश्न किए साल दर साल बदस्तूर बने रहने वाले शिक्षकों, विद्यार्थियों को। क्या बाँकी विषयों के लिए भी इसी तरह की मारा-मारी है? पता नहीं , पर इंटरव्यू के लिए आयी इस भीड़ को देख कर दिल डूबने लगता है । हर कोई योग्य दिखता है , हर कोई शोध कर चुका है, बहुतों ने सालों-साल पढ़ाया भी है, ऐसे में सब धान बाइस पसेरी की तर्ज़ पर हर किसी को कैसे एक ही मयार पर जाँचा जा सकता है। अभ्यर्थी की योग्यता का पैमाना क्या तय किया जाये, इसका कोई वस्तुनिष्ठ समाधान है भी क्या?

बहरहाल, यहाँ तो शुरुआत में फिर भी साक्षात्कार का नाम सार्थक करने का जज़्बा देखा गया , पर बाद के कैंडिडेट के लिए रस्मी मुँह दिखाई से ही काम चलाना पड़ा।मुझसे भी बस ऊपर-ऊपर से पूछ कर रस्म निबाह दिया गया। मसलन, हिंदी की विद्यार्थी हो कर इंग्लिश में बायोडाटा क्यूँ बनाया। और यह प्रश्न भी प्रिंसिपल जो हिंदी के नहीं थे उनके मुख से निकला। कहने लगे, मैं तो तरस गया हूँ कि शुद्ध हिंदी में लिखा गया बायोडाटा देखूँ। मन हुआ कहूँ कि सर पता होता कि आप को पांडुलिपियाँ पढ़ने का इतना शौक़ है तो भोजपत्र या तालपत्र में स्याही से अंकित कर के बायोडाटा ले आती, आपकी तृषित आँखों को सांस्कृतिक नमूना तो दिखता। हिंदी ना पढ़ी मानो बाँकी सभी भाषा का प्रयोग करने से बैन हो गये। बहरहाल, शोध का नाम और शोध निर्देशक की जानकारी बायोडाटा में लिखे होने के बाद भी तस्कीन करने के लिए मेरे मुँह से भी सुना गया। सबसे मज़ेदार वह क्षण था जब बाहर से आए एक्स्पर्ट ने ये पूछा कि क्या सब पढ़ा सकती हो? एक पल के लिए लगा मानो कौन बनेगा करोड़पति की हॉट सीट पर बैठी हूँ और 7 करोड़ के लिए यह पंद्रहवाँ प्रश्न, ये रहा आपकी कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने। आँखों में चमक कौंध गयी। आवाज़ बुलंद। मन ने कहा “जो बोलेंगे माई-बाप सब पढ़ा देंगे, doesn’t matter, as long as आप लोग लें लें”, पर ज़ुबान ने बात सम्भाली , संयत आवाज़ में कहा “ कथा सहित्य, आलोचना, ये सब, कविताएँ भी”। तो बस इसी बात पर समय समाप्ति की घोषणा भी हो गयी , और बाहर जाने का दरवाज़ा लड़खड़ाते हुए कदमों से ढूँढ कर जब बाहर आयी तब तक अगला कैंडिडेट घुस चुका था। न साक्षात्कार लेने वाले को दो मिनट ठहर कर कुछ सोचने का मौक़ा ना बाहर जाने वाले विद्यार्थी को।

लोग बता रहे थे कि दो दिन के अंदर ही लिस्ट निकाल दी जाएगी । मतलब कि पूरी प्रक्रिया इतनी यांत्रिक है कि दिल-दिमाग़ लगाने की भी ज़रूरत नहीं है , कैंडिडेट्स को भी संशय की एक-दो रात ही जीनी पड़ेगी। फिर कोई नया कॉलेज, नया इंटरव्यू पर वही पुरानी ड्रिल।

ख़ैर, अभी तो सफ़र पर निकलने की बस तैयारी ही हुई है, अभी तो कई आसमाँ फतेह करने हैं। राही मासूम रज़ा की वह बात याद आ रही है, कि हमारे युग के युवाओं के लिए नौकरी ही सबसे बड़ा एडवेंचर है।

इंटरव्यू ख़त्म होने के बाद एक महिला ने पूछा कि कैसा रहा तुम्हारा? मैंने कहा ठीक ही था, बस हो गया। पता चला वो इस तरह से वर्षों से साक्षात्कार देती आ रही हैं और अब थक गई हैं। पर विदा लेते वक़्त इतना ही कहा कि हमने तो बहुत स्ट्रगल किया है, तुम लोगों को न करना पड़े, सिस्टम ठीक हो जाये।

मैं मेट्रो के लिए ऑटो लेते वक़्त बस यही गुनगुनाती रही
“ जो हम पे गुज़री सो गुज़री, मग़र शब-ए-हिज़राँ…….”

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