
हूँ जहां, वहाँ बहुत है ठंड।
भेज दो अपने हिस्से की थोड़ी धूप ।
भेज दो वह चमकता बादल का सफ़ेद टुकड़ा
जिस पर सूरज करता है किरणों की अठखेलियाँ , उस
खेल का एक सिरा थमा दो।
जिस ज़मीन के टुकड़े पर हम हैं, वहाँ
सुबह हो या शाम
दिन रहता है एक ही समान
पत्ता पत्ता थमा थमा, हवा
मेरी गलियों की धूल भी नहीं उड़ा पाती ।
भेज दो सरसरा कर टहनियों को झकझोर
देने वाली थोड़ी सी हवा ।
भेज दो उस पार से थोड़ी गर्मियाँ कि
कोहरे की यह बरसों ठहरी बर्फ़ पिघल सके
इतना कि एक मटमैला बरसाती नाला ही बन सके।
कुछ महीनों, कुछ दिनों के लिए नहीं, चंद
घड़ियों के लिए ही सही
अपनी मौसमें उधार दे दो।






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