
कभी छतों पर से,
तो कभी सूनी खिड्कियों से,
तो कभी गलियों की मोड़ों से
दिख जाया करता है वो।
कभी किसी बच्चे की भोली आँखों में,
तो कभी नौजवान आहों में
और कभी बूढ़ी तसबीहों में
अपनी आहट दे जाता है वो।
कभी किसी गरीब की सीलन लगी दीवारों से
तो कभी किसी अमीर की मीनारों-सी मुँडेरों से
और उनकी रसोई से आती सेवइयों की ख़ुशबू में
अपनी चाशनी घोल जाया करता है वो।
पर तमाम हसरतों और बेसब्र निगाहों को
एक साथ खुशी मनाने और ईद मुबारक कहने का
छोटा ही सही, मौका दे जाता है वो,
हाँ, वो ईद का चाँद।






Leave a comment