
आज जब तुम्हारे इस तरह दुनियाँ से जाने का सुना,
तो चलते फिरते शरीर के भीतर,
मन कहीं ठहर गया।
जानती नहीं तुम्हें!
कभी पास से भी देखा हो,
ऐसा कुछ याद नहीं ।
महज़ ज़िक्र था तुम्हारा या
कहीं कोई धुंधली परछाई-सी देखी थी।
पर आज जब तुम्हारे जाने का नियत हो गया
तो पता नहीं किस कोने में छुपे आँसू
आँखों तक आकर भी शायद
निकलने की करते रहे फ़रियाद।
तुम्हें जानती तो नहीं,
बस ज़िक्र ही भर का रिश्ता था
पर क्यूँ सब कुछ ठहरा-ठहरा है?
तुम्हारे यूँ चले जाने पे इस क़दर चुप हो जाने का
थोड़ा ही सही पर अधिकार तो मेरा है।
मन को समझाया है ,
शायद अब तुम होंगे पुरसुकूँ,
देह ने तुम्हारी कितना दर्द उठाया था,
पर लड़ने का हौंसला तुमने
आख़िर-आख़िर तक दिखलाया था।
बस जहां भी हो, तुम ख़ुश रहना
अपने हंसी में भरपूर।
बस ये ख़याल ही हम सब
जाने-अनजानों को समझो
डूबते को तिनके का सहारा है ।
मुश्किल होता है जीना उनके लिए
जो पीछे छूट जाते हैं
क्योंकि तुम्हारे न होने का एहसास
हर दिन हर पल साथ होगा
ऐसा नहीं कहती-
क्योंकि अपने सामने पड़ी ज़िंदगी
जल्द ही खड़ी कर देगी चुनौतियाँ हज़ार
और उनसे जूझते हुए ही धुंधली होने लगेंगी संवेदनाएँ।
पर जब पूरे उथल-पुथल के बाद
शाम के धुँधलके में या
आधी रात को अचानक से नींद खुलने के बाद
या , हर सुबह की चाय के साथ
अचानक उठेगी मन में एक कसक़,
दिल में कहीं एक टीस!
और आवाज़ नहीं सुन पाएँगे कोई
पर दिल से उठ रही होगी कराह
कि सब तो हैं, सब कुछ तो है
फिर ये क्या है , क्यों है
कि दिखते नहीं हो तुम पास।






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