मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे!
The ghazal was first issued by HMV in 1971

I

शकील बदायूँनी की लिखी इस खूबसूरत नज़्म को जब बेग़म अख़्तर की आवाज़ में हम सुनते हैं तो न केवल गाने वाले की दर्द भरी आवाज़ हमें पिघला देती है, बल्कि नज़्म को लिखने वाले शायर की शख्सियत और उसकी शायरी की गहराई से भी वाबस्ता होते जाते हैं।

इस कालातीत ग़ज़ल को हिन्दी फिल्म जगत के मशहूर संगीतकार ख़ैयाम ने सुरों से सजाया था। शास्त्रीय राग  में बांधी गयी इस नज़्म को बेग़म अख्तर ने अपनी रूहानी आवाज़ में गाकर जो मुकाम दिया, वह समय और स्थान की सीमाओं से मुक्त होकर मौसिक़ी की दुनियाँ में आज भी अनमोल माना जाता है।  ख़ैयाम ने नज़्म को दरबारी राग में पिरोते और ताल मुग़लई में ढालते हुए संगीत को ऐसा बनाया जिससे कि नज़्म के हर अल्फ़ाज़ में गूँथे हुए भावों को खिल कर उभरने का मौका मिला।  

बेग़म अख़्तर ने शकील की लिखी नज़मों को पहले भी गाया था। मसलन शकील की ही, “ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”(संगीत- मुरली मनोहर स्वरूप), उन्होंने 1950 के दशक में ही गाया था। “मेरे हमनफ़स”  को शकील ने बहुत बाद में जाकर , तकरीबन पंद्रह सालों बाद लिखा। अपनी जीवनी में बेग़म अख़्तर के हवाले से यह पता चलता है कि, शकील और अख्तर में कुछ धार्मिक मसलों पर आपस में कहा-सुनी हो गयी थी, और अख़्तर इस बात पर खफा भी हो गईं थीं। पर शकील समय-समय पर बेग़म अख़्तर के गाने के लिए अपनी नज़्में लिख-लिख कर भेजा करते थे , पर “ए मोहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया” के पंद्रह साल बाद तक, यानि 1971 तक उन्होंने शकील की कोई नज़्म नहीं गायी। यह नाराजगी 1971 में जाकर खत्म हुई, और बेग़म अख्तर ने “मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा ” को रिकॉर्ड कर के अमर कर दिया। हालांकि इस पूरी अवधि में बेग़म साहिबा ने शकील की पहले लिखी नज़्म ए मोहब्बत को लगभग हर कंसर्ट में गाया। पर यह भी किस्मत की ही बात थी कि “मेरे हमनफ़स” की प्रसिद्धि को देखने के लिए शकील ज़िंदा न रह सके, क्योंकि 20 अप्रैल 1970 को ही शकील का निधन हो गया था”।

इस नज़्म की प्रसिद्धि के संदर्भ में ही, पाकिस्तान की प्रसिद्ध गजल गायिका ताहिरा सईद, बेगम अख्तर को याद करते हुए इस नज़्म पर भी बात करती हैं :

बहुत सारे लोग अख्तरी बाई फैज़ाबादी को बेग़म अख्तर के नाम से पुकारते थे, पर वह मेरे और मेरी अम्मी (मल्लिका पुखराज) के लिए हमेशा से ‘अख्तरी’ थीं। मेरी अम्मी जो उनसे दो साल बड़ी थीं उन्हें न केवल अपना दोस्त बल्कि छोटी बहन समझती थीं। मुझे और अम्मी दोनों ही को, उनके गाये ग़ज़लों में सबसे ज़्यादा नज़्म जो पसंद थी वह थी शकील बदायूँनी का लिखा हुआ: ‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’।

शकील की शायरी अपने सबसे कोमल और सुंदर रूप में इस नज़्म में आकार लेती है जहां एक साथ बहुत सारे भाव हमें यहाँ नज़र आते हैं-

मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे

मैं हूँ दर्द-ए-इश्क से जां वलब, मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे।

मैं ग़म-ए-जहां से निढाल हूँ, के सरापा दर्द-ओ- मलाल हूँ,

जो लिखी है मेरे नसीब में, वो आलम किसी को खुदा न दे।

न ये ज़िंदगी मेरी ज़िंदगी, न ये दास्तान मेरी दास्तान,

मैं ख़याल-ओ-वहम से दूर हूँ, मुझे आज कोई सदा न दे।

मेरे घर से दूर हैं राहतें, मुझे ढूंढती हैं मुसीबतें

मुझे खौफ ये है के मेरा पता, कोई गर्दिशों को बता न दे।

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तिरा क्या भरोसा है चारागर,

ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़तसर, मिरा दर्द और बढ़ा न दे।

मेरा अज़्म इतना बुलंद है, के पराए शोलों का डर नहीं,

मुझे खौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे।

मेरे दाग़-ए-दिल से है रोशनी, इसी रोशनी से है ज़िंदगी,

मुझे डर है ऐ मेरे चारागर, ये चिराग तू ही बुझा न दे।

मेरे चश्म-ए-शौक तेरा भरम, रहे उम्र भर यूं ही ताज़ा दम,

ना पुकार उस को के वो सनम, कहीं जल के जलवा दिखा न दे।

दर-ए-यार पर बड़ी धूम है, वही आशिक़ों का हुजूम है,

अभी नींद आई है हुस्न को, कोई शोर कर के जगा न दे।

कभी जाम लब से लगा दिया, कभी मुस्करा के हटा दिया,

तेरी छेड़-छाड़ ए साकिया, मेरी तिश्नगी को बढ़ा न दे।

वो उठें हैं लेके खम- ओ- सुबू, अरे ए ‘शकील’ कहाँ हैं तू,

तेरा जाम लेने को बज़्म में, कोई और हाथ बढ़ा न दे”।   

इस पूरी नज़्म में शकील ने एक साथ कई भावों को जगह दी है। मोहब्बत , वफ़ा और दिल के मंसूबे – ऐसे कई जज़्बात यहाँ पिरोये गए है, पर एक प्रमुख अंतर्धारा जो शुरू से लेकर के आखिर तक बनी हुई है वह है- उम्मीद, एक तरह की प्रार्थना, एक इल्तिजा, एक आस, एक ख़्वाहिश जो कोई भी किसी से कर सकता है, भले ही यहाँ दोस्ती या प्यार को आधार बनाया गया है। ज़िंदगी से रूठे हुए शख्स को जिसे रिश्तों से बहुत कम उम्मीद हो, वह अपने सब से क़रीबी इंसान से बस उसके भरोसे को क़ायम रखने की इल्तिजा करता है। नज़्म में कुछ अच्छे पलों की याद है, तो कुछ गुज़िश्ता ग़मों के फिर से उखड़ जाने की बेचैनी। पूरी नज़्म ऐसे ही भावों को अपने में समेटे हुए,  सुनने वालों की रूह में उतर जाती है, और हर सुनने वाला नज़्म से अपने स्तर पर एक रिश्ता क़ायम कर सकता है। इस गज़ल को सुनने वालों को लगता है कि मानो यह उसी के लिखा गया हो, हर अल्फ़ाज़, हर हर्फ़ सिर्फ उसी के लिए गढ़ा गया हो।

शकील की इस मशहूर नज़्म को कई बड़े ग़ज़ल गायकों ने अपनी आवाज़ दी है। बेग़म अख्तर के अलावा, फ़रीदा खानुम, जगजीत सिंह, शोभा गुर्टू, मुन्नी बेग़म, पंडित अजय पोहांकर जैसे बड़े उस्तादों ने इसे गाया हुआ है। आज के समय में भी कुछ नए गायक इस ग़ज़ल को गा रहे हैं। इनमें  से अली रज़ा , अली सेठी , प्रतिभा सिंह बघेल महत्वपूर्ण हैं।

हम इन सभी फनकारों द्वारा गए गए इस नज़्म को सुन कर एक श्रोता की तरह, एक भावक की तरह, हम इस नज़्म की खूबसूरती को समझने का प्रयास करते हैं।

बेग़म अख्तर

देखा जाए तो बाद के इन सभी ग़ज़ल गायको ने इस नज़्म को और भी ज्यादा अलंकृत कर के, और भी अधिक विस्तार से गाया है, और उन्हें गाने में सफलता भी बहुत मिली है, पर बेग़म अख्तर के गाये गए नज़्म में दर्द की , वेदना की जो अंतर्निहित छाया है, वह अपने आप में अकेली है।

फ़रीदा खानुम

फ़रीदा खानुम की पेशकश भी सुनने वालों को एक अलग ही दुनियाँ में ले कर के जाती है, जहां वह अपनी विलंबित और गहरी गायकी से नज़्म के प्रभाव को गहरा कर देती है। बेग़म अख्तर जब इस नज़्म को गाती हैं तो लगता है कि ज़िंदगी की शाम में कोई घने पेड़ के धुंधलके में बैठा अपनी ज़िंदगी का लेखा-जोखा दे रहा हो, खुद से जवाब-तलब कर रहा हो, पर फरीदा खानुम जब इस ग़ज़ल को गाती हैं तो ऐसा लगता है कि कोई बड़े इत्मीनान से, बड़ी तसल्ली से, अपने हालत को-अपनी ज़िंदगी को बयां कर रहा है।

जिस ठहराव के साथ फरीदा इसे गाती हैं, वह नज़्म के एक-एक अल्फ़ाज़ को सुनने वालों के अंदर उतारता जाता है। जिस अंदाज़ से फरीदा गाती हैं- “मिरा अज़्म इतना बलन्द है, कि पराए शोलों का डर नहीं”, वह अपने आप में एक statement लगता है, एक ऐसी चुनौती जो यह कहना चाहती है कि मुझे खुद पर, खुद के वजूद पर इतना भरोसा है कि दुनियाँ का कोई खौफ नहीं है, अगर डर है तो खुद अपना। बहुत खूबसूरती से फ़रीदा खानुम इसे गाती हैं, और बेग़म अख्तर भी इस पंक्ति पर आकर अपनी आवाज़ में एक बुलंदी ले आती हैं, और लगता है कि वाकई उन जैसी शख्सियत को किसी का खौफ नहीं।

जगजीत सिंह

मुन्नी बेग़म

जगजीत सिंह और मुन्नी बेग़म ने इस ग़ज़ल के संगीत को शकील से अलग कर के गाया है, और अपने-आप में ये प्रयोग भी तारीफ के काबिल हैं। जगजीत सिंह ग़ज़ल ले पहले जिस खूबसूरती से आलाप लेते हैं, वह आगे आने आले गीत के मूड को पहले से सेट कर देता है। सुनने वालों को वो पहले ही एक ऐसे स्पेस में लेकर चले जाते हैं जहां, ग़ज़ल की गहराइयों में उतरते चले जाने को जी होता है।

पंडित अजय पोहांकर

अली रज़ा

अली सेठी

II

थोड़ी चर्चा अब शकील बदायूँनी पर ( संदर्भ स्रोत: आलोचक रक्षन्दा जलील , अनुराग भारद्वाज )

शकील बदायूँनी का जन्म 3 अगस्त 1916 को उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में हुआ था। उनका वास्तविक नाम शकील अहमद ‘बदायूँनी’ था।  1936 में शकील अलीगढ़ जिसे “पूरब का ऑक्सफोर्ड “ माना जाता था, पढ़ने आए और गज़लें लिखने का सिलसिला यही अलीगढ़ में शुरू हुआ।  कॉलेज स्तर के मुशायरों से, शुरू यह सफर धीरे-धीरे इस हद तक बढ़ा कि, शकील बहुत कम समय में  अपने शहर के बड़े ग़ज़ल-गो के रूप में मशहूर हो गए। जैसा कि उन दिनों होता था, दूर-दराज के शहरों और क़स्बों के कई युवा उर्दू लेखकों की तरह, जो बंबई में फिल्म इंडस्ट्री में अपने फ़न दिखलाने आते थे, शकील भी आए।  पर शकील को फिल्मी दुनियाँ में कामयाबी बहुत जल्द ही मिल गयी और वह भी सिर्फ अपने ग़ज़ल लिखने की काबिलीयत के बदौलत। रोजगार के लिए हालांकि शकील ने दिल्ली में सरकारी आपूर्ति विभाग में बेहद ही कम अरसे के लिये(1942-46) काम किया था, पर नौकरी की पाबंदी उन्हें रास नहीं आई और बंबई फिल्मी दुनियाँ में गीत लेखन को उन्होंने अपना एक मात्र काम बना लिया। दिल्ली में शकील ने शायरी के तकनीकी पहलुओं को समझा। उन्होंने,  अंग्रेजी साहित्य के ‘फ्री वर्स’ और ‘ब्लैंक वर्स’ के उर्दू में इस्तेमाल को समझा। इन दोनों का मतलब है कि वो कविता जिनमें शब्दों को मीटर और तरन्नुम में बांधकर नहीं लिखा जाता। दिल्ली में रहते हुए शकील ने लगभग पूरे हिंदुस्तान के अलग-अलग शहरों में होने वाले मुशायरों में शिरकत की और उन्हें समझ आया कि मशहूर होने लिए सुखन के साथ साथ अंदाज़े बयान भी चुस्त होना चाहि। तिस पर अलफ़ाज़ अगर सादे हों और सरल भाषा में लिखे जाएं तो सोने पर सुहागा है।  मुंबई आकर उन्होंने सादे अंदाज़ में ग़ज़ल कहना और मुकम्मल कर लिया था उन्होंने। अपने कई समकालीनों में शकील बदायूँनी को लगभग पूरी तरह से केवल अपनी कविता-नज़्म  के माध्यम से अपना जीवन यापन करने का दुर्लभ  गौरव प्राप्त था।

यह वह दौर था, जब तरक़्क़ी पसंद शायरी के लिए एक राष्ट्रव्यापी मुहिम छिड़ी हुई थी। एक ऐसा वक़्त जब, कविता के विषय के रूप में ‘’शबाब और इंकलाब’” में आपसी ज़ंग छिड़ी हुई थी, और पलड़ा हर लहजे में इंकलाबी शायरी की तरफ झुकता था। इस समय के सभी बड़े और नामचीन शायर और कवि- चाहे वह, फैज-अहमद-फैज हों , कैफी आज़मी हों, साहिर लुधियानवी हो, मजरूह सुल्तानपुरी हों, या जां निसार अख्तर हों, सब प्रगतिवादी कविता से ताल्लुक रखते थे। इन सबके बीच, शकील ने अपनी कविता के लिए “प्रेम और शबाब” से भरे विषयवस्तु को चुना और ताउम्र अपने इस रुझान पर बने रहे। यह दौर जब, आजादी के बाद, देश-निर्माण के लिए, समाजवाद को, आर्थिक-समानता को उद्देश्य बनाया जा रहा था, शकील जीवन में निहित प्रेम को, कोमल संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में उतार रहे थे। यह एक तरह से कठिन भी था और काफी साहसिक भी, क्योंकि  समाज और समय की प्रचलित धारा के विरुद्ध संघर्ष कर के एक बिलकुल भिन्न पहचान बनाना आसान तो किसी हिसाब से नहीं होता। शकील अपने प्रेम के गीतों के लिए अमर हो गए। वह अपनी लेखनी के इस ज़ुदा अंदाज़ के बारे में अक्सर कहते थे:

“मैं शकील

दिल का हूँ तर्जुमा 

के मुहब्बत का हूँ राजदां

मुझे फ़क्र हैं मेरी शायरी

मेरी ज़िंदगी से जुदा नहीं”

शकील को फिल्मी दुनियाँ में सफलता देखा जाए तो पहले झटके में ही  मिल गयी। नौशाद के साथ अपने पहले गीत में ही उन्होंने अपने शब्दों के जादू से सब को बांध लिया। ‘’अफ़साना लिख रही हूँ, दिल-ए-बेक़रार का, आँखों में रंग भर के तेरे इंतज़ार का” से  नौशाद और शकील की जोड़ी ने इतिहास रच दिया और आगे आने वाले 25 सालों में इस जोड़ी ने कई मील के पत्थर कायम किए। बाद में फिल्मों जैसे कि संघर्ष, राम और श्याम, दिल दिया दर्द लिया, गंगा जमुना, मुग़ल-ए-आजम के गीतों को भरपूर सराहा गया। शकील की नौशाद से दोस्ती की मिसाल यही थी, कि जब तपेदिक के इलाज़ के लिए शकील अस्पताल में भर्ती हुए तब नौशाद उनके लिए तीन फिल्मों में गाने लिखने का कॉन्ट्रैक्ट करवाकर लाये थे और फीस भी दस गुना ज़्यादा दिलवाई थी ताकि उनका इलाज़ आसानी से हो सके।

नौशाद के साथ

हालांकि उस दौर के अन्य संगीतकारों जैसे कि रवि, हेमंत कुमार, इन सब के साथ भी शकील ने बहुत काम किया।और इन गीतों के लिए शकील को फिल्म फेयर पुरस्कारों से भी नवाजा गया। मसलन, बीस साल बाद के गीत, कहीं दीप जले कहीं दिल, चौंदवी का चाँद, ये सब गीत बहुत मक़बूल हुए।

सरदार जाफ़री जो, हालांकि शकील की रोमांटिक शायरी के उतने बड़े प्रशंसक नहीं थे, ने उनके लिए कहा है:  “शकील ग़ज़ल कहना भी जानते हैं और गाना भी। मैं अपनी अदबी ज़िन्दगी में उनसे दूर रहा हूं लेकिन उनकी ग़ज़ल से हमेशा कुर्बत महसूस की है”।

और साहिर लुधयानवी के अनुसार:  ‘जिगर और फ़िराक के बाद आने वाली पीढ़ी में शकील एकमात्र शायर हैं जिन्होंने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना है….”।  

साहिर के साथ

शकील की शायरी में उनका व्यक्तित्व झलकता था, इतना ही कि जिगर मुरादाबादी ने बहुत पहले ही यह समझ कर कह दिया था कि वह शायर-ए-फितरत हैं और उनकी शयरी किसी नियम पर या सिर्फ अल्फ़ाज़ों के हेर-फेर से नहीं बनती बल्कि उनकी शख्सियत का ही विस्तार है। उनकी ग़ज़लों में दर्द कि जो एक अंतर्धारा बहती है, संभवतः यही वजह है कि बेग़म अख्तर जैसी आवाज़ जिसमें इतनी गहराई और वेदना घुली हुई है, वह उसे बड़ी ही सहजता से उभार देती थी। इसी तरह तलत महमूद जो अपनी दर्द भरी आवाज़ में गाकर गीत को सुनने वालों के दिल में उतार देते थे, वह भी शकील की नज़्म को बार-बार गाया करते थे। हंगामा-ए-ग़म और ग़म-ए-आशिक़ी जैसे नज़मों को तलत ने भरपूर शिद्दत से गाकर मशहूर कर दिया।

Shakeel was an excellent Urdu poet in his own right, with a strong sense of aesthetics and polish, and this post attempts to analyze some of his finest collaborations with other music directors. He applied his talents to describe the beauty, love romance, emotional, sentimental and passionate experiences as well as joys and sorrows of life. The tremendous popularity of his film lyrics taught him that even the most serious and thought-provoking ideas when expressed in simple words would appeal to the listeners. His privations and adversity did not turn him sour as he transformed pathos into love.”

शकील को मौसिकी की भी पूरी समझ थी। इतने बड़े संगीतकारों के साथ इतने लंबे अरसे तक इतने सुंदर नगमे के पीछे एक वजह यह भी थी कि उन्हें खुद ही सुरों का, राग-रागिनियों का बड़ा ज्ञान था। राग केदार में गायी हुई एक बंदिश यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि शकील खुद भी सुरों के साधक थे। फिल्म पाक़-दामन में एक मुशायरे के दृश्य के लिए शकील यह गीत गाते हैं जिसे संगीत से बांधा था उस दौर के प्रसिद्ध संगीत निर्देशक ग़ुलाम मोहम्मद ने।ये वही ग़ुलाम मोहम्मद थे जिन्होंने मैडम नूरजहां और लता मंगेशकर की आवाज़ को फिल्मी दुनियाँ में प्रवेश दिलवाया था।

References:

https://thewire.in/books/shakeel-badayuni-poet lyricisthttps://www.filmfare.com/interviews/remembering-shakeel-badyanis-work-42136-1.html

Mere ham-nafas mujhe dost ban kar daga na de

https://www.thefridaytimes.com/tahira-syeds-choice-of-evergreen-songs/

https://thewire.in/books/shakeel-badayuni-poet-lyricist

https://www.cinemaazi.com/people/shakeel-badayuni

https://www.thehindu.com/features/friday-review/Straight-from-the-heart/article14589030.ece

https://satyagrah.scroll.in/article/106320/shakeel-badayuni-life-work-profile

One response to “मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे!”

  1. Vijay Mishra avatar
    Vijay Mishra

    शकील बदायूँनीके बारे इतनु बिस्तृत जानकारी मुझे तो बिल्कुल नहीं था। मुझे तो लगता है गीत और गजल की इतनी सुन्दर रचना उनको खुदा की देन हैं। बहुत ही कम उम्र से उन्होने इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक कदम रखा जो सिर्फ खुदा की देन ही हो सकता है। नौशाद साहेब का साथ इनको चार चांद लगा दिया। बेगम अक्खतर ने इनके गीत को उस समय आम जनता दिल में पहचान करबाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के दिनो में बहुत सारे गजल गायक और फिल्मी गयको ने अपने आवाज देकर इन्हें अजर-अमर बना दिया है। इनकी एक एक रचना की जितनी तारीफ की जाए उतना ही कम है।

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