(15 मार्च 1933–18 सितंबर 2020)
मानव इतिहास के पन्नों पर कुछ ऐसे नाम समय-समय पर दर्ज़ होते रहते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से न केवल हमारी इंसानी सभ्यता को समृद्ध किया है, बल्कि उसकी दिशा को भी मोड़ा है। अभी हाल ही में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश, रूथ बेदर गिन्स्बर्ग का निधन हुआ, जो शायद हमारे लिए कोई बड़ी खबर न हो, पर सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता का स्वप्न देखने वालों के लिए एक बड़ी महत्वपूर्ण घटना है।
अमेरिका जैसे आधुनिक समाज में आज हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि कैसे एक वह भी दौर था, जब स्त्रियों के साथ कानूनी तौर पर भेदभाव किया जाता था और उन तमाम अवसरों और अधिकारों से उन्हें वंचित रखा जाता था, जिसके हक़दार सिर्फ पुरुष थे। रूथ बेदर ने अमेरिकी समाज की इस असमानता और स्त्रियों के प्रति भेदभाव की नीति का कानूनी तौर पर मुकाबला किया और स्त्रियों को उनके संविधान सम्मत अधिकार दिलाये। जस्टिस गिन्स्बर्ग के निधन से इतिहास के एक ऐसे युग और जीवन की स्वर्णिम समाप्ति हुई है, जब स्त्री-पुरुष अधिकारों की समानता को क़ानूनी संरक्षण देने की मुहिम शुरू हुई और यह उन्हीं के अनथक प्रयासों की परिणति है कि स्त्री अधिकारों का दायरा भविष्य के लिए, थोड़ा और विस्तृत हो पाया।
पर, जस्टिस गिन्स्बर्ग की अपनी ज़िंदगी भी अपने आप में एक मिसाल से कम नहीं थी। एक यहूदी परिवार में जन्मी रूथ की माँ (जिन्होंने उन्हें गहरा प्रभावित किया था) अल्पायु में ही गुज़र गईं थीं, और शुरुआती संघर्षों के बाद भी उन्होंने कॉर्नेल विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद, कानून की पढ़ाई के लिए 1956 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाली 580 विद्यार्थियों की कक्षा में रूथ, उन नौ लड़कियों में से एक थीं, जिन्हें विश्वविद्यालय के डीन ने ही पूछा था कि आप लड़कियां यहाँ हार्वर्ड में पुरुषों के स्थान पर क्यूँ हैं? इस एक वाक्य से हम उस समय के अमेरिकी समाज की मनोदशा का पता लगा सकते हैं, जो स्त्रियों के प्रति इस हद तक भेद-भाव ग्रस्त था।

अपने शुरुआती करियर में रूथ स्वयं कई स्तर पर लैंगिक भेदभाव का शिकार हुई थीं। 1960 में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने उन्हें सिर्फ़ इस वजह से अपने अंदर क्लर्कशिप नहीं दी थी कि, वह एक स्त्री थीं और इस कारण वकालत करने से वंचित हो गईं। बाद में वह रूटर्ग्स लॉं स्कूल में कानून की प्रोफेसर बनीं, पर यहाँ भी एक दूसरे स्तर पर भेदभाव को महसूस किया। इस स्कूल में यह पहले से ही तय था कि, उन्हें अपने पुरुष सह-कर्मियों की अपेक्षा कम वेतन मिलेगा क्योंकि वह एक स्त्री हैं और साथ ही एक कमाऊ पति भी उनके पास है। पर इन बाधाओं के बावजूद भी, अपने काम की बदौलत रूथ अमेरिका के सर्वोच्च कोर्ट की न्यायाधीश के पद पर आसीन हुईं और ऐसा करने वाली वह अमेरिकी इतिहास में, सैंड्रा डे ओ’कोनर के बाद दूसरी महिला थीं।
आगे चल कर, रूथ ने, 1970 में स्त्री अधिकारों के लिए समर्पित अमेरिका का पहला कानूनी जर्नल, “विमेन’स राइट्स लॉं रिपोर्टर’ निकाला और कोलम्बिया लॉं स्कूल में अपने अध्यापन के दौरान लैंगिक भेदभाव पर आधारित, पहला कानूनी केसबुक लिखा। 1971 में, रूथ, अमेरिकी विधि व्यवस्था की एक ऐसी अहम सुनवाई/निर्णय का हिस्सा बनीं, जो मील का पत्थर साबित हुआ। ‘रीड बनाम रीड केस’ के नाम से प्रसिद्ध इस सुनवाई में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने, एक प्रचलित कानून को असंवैधानिक करार दिया था, जो किसी भी संपत्ति के संरक्षक और वितरक के रूप में एक पुरुष को स्त्रियों की अपेक्षा वरीयता देता था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी केस के सिलसिले में यह प्रसिद्ध निर्णय दिया था कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन में जिस समान कानूनी सुरक्षा (equal protection of law) की बात की गयी है, वह राज्य द्वारा लैंगिक आधार पर किए जाने वाले भेद-भाव से भी नागरिकों की सुरक्षा करेगा। अमेरिकी विधि इतिहास में शायद यह पहली बार था, जब सर्वोच्च न्यायालय ने, लैंगिक भेदभाव बरतने के आधार पर एक राज्य स्तरीय कानून को असंवैधानिक करार देते हुए ख़ारिज़ कर दिया था।
रूथ बेदर के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि वह स्त्री अधिकारों की समर्थक थीं, बल्कि यह, कि, उन्होंने पुरुषों के अधिकार को भी, कानूनी मान्यता दिलवाई। ‘वेनबर्गर vs विसेनफ़िल्ड केस’ (1975) में एक विधुर पुरुष को रूथ ने क़ानूनी अधिकार दिलवाया था, जिसे अपने बच्चे के पालन-पोषण के लिए वो सारी क़ानूनी सुविधाएं नहीं दी जा रहीं थी, जो आम तौर पर स्त्रियों या माताओं को दी जातीं थी। और देखा जाये तो लैंगिक समानता वास्तव में, स्त्री और पुरुष दोनों ही लिंगों की बराबरी का सिद्धान्त है, और रूथ इसकी सच्ची अगुआ थीं।

1972 में रूथ, अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन (एक गैर-लाभकारी संस्था, जो जनहित के लिए नागरिक अधिकारों से संबन्धित केस पर काम करती थी) से जुड़ीं, जहां पर उन्होंने, ‘स्त्री अधिकार प्रोजेक्ट’ की नींव रखी। इस प्रोजेक्ट ने 300 से भी ज़्यादा ऐसे केस में हिस्सा लिया जो लैंगिक भेदभाव से संबंधित थे। इस प्रोजेक्ट की अध्यक्ष के तौर पर रूथ ने सर्वोच्च न्यायालय में लैंगिक असमानता से संबन्धित 6 महत्वपूर्ण केस, 1973 से 1976 के दौरान लड़े, जिनमें से 5 में सफलता भी मिली। रूथ ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने एक केस (फ़्रंटिएरो बनाम रिचर्डसन केस, 1973) के सिलसिले में ‘सारा ग्रिमके’ (19वीं शताब्दी की प्रमुख नारीवादी समाजसुधारक, जिन्हें महिलाओं के मतदान के अधिकार संबंधी आंदोलन की जननी के रूप में जाना जाता है) के एक कथन को दुहराया था “मैं अपनी स्त्री जाति के लिए किसी भी प्रकार की रियायत की दर्खास्त नहीं करती। बस अपने भाइयों से यह मांग करती हूँ कि बस वे हमारी गरदनों से अपने पाँव हटा लें” (I ask no favour for my sex. All I ask of our brethren is that they take their feet off our necks.)
सन 1993 में, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने रूथ को सर्वोच्च न्यायालय की सम्बद्ध-न्यायाधीश (associated justice) के रूप में प्रस्तावित किया था। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश के रूप में भी रूथ ने कई महत्वपूर्ण निर्णय दिये जिसने स्त्री अधिकारों की नयी व्याख्या की। सन, 1996 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम वर्जीनिया केस’ में, जस्टिस गिन्स्बर्ग ने, वह प्रसिद्ध निर्णय दिया था, जिसने केवल पुरुषों के लिए आरक्षित वर्जीनिया मिलिटरी इंस्टीट्यूट के बंद द्वार स्त्रियों के लिए भी खोल दिये। इस निर्णय ने स्त्री अधिकारों के एक नए युग की शुरुआत की।
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अपने पूरे कार्यकाल में रूथ बेदर की ख्याति एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में थी, जो बहुसंख्यक निर्णयों (majority opinion) से अपनी असहमति जताने के लिए जानी जाती थीं। और हम समझ सकते हैं कि न्याय के उस सर्वोच्च स्थान पर बैठ कर अपने विवेक को जागृत रखते हुए असहमति दर्ज़ करवा पाने का दम-खम रखना कितना कठिन हो सकता है। मसलन, 2007 में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय में जस्टिस गिन्स्बर्ग ने अपनी असहमति दर्ज़ करवाई थी, जबकि अन्य न्यायधीशों ने उस केस की याचिकाकर्ता लिली लेड्बेटर (जिसे एकसमान काम के लिए भी, अपने साथी पुरुषकर्मियों से कम वेतन दिया जा रहा था) के खिलाफ निर्णय दिया था। पर रूथ की उस ऐतिहासिक असहमति ने अंतत: सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया, जिसके परिणामस्वरूप, सन 2009 में अमेरिका में ‘लिली लेड्बेटर फेयर पे एक्ट’ लागू किया गया, जो आय में लैंगिक समानता लाने का एक महत्वपूर्ण कदम बना।
रूथ बेदर की मानवाधिकारों के लिए प्रतिबद्धता जीवन के अंतिम समय तक बनी रही और स्त्री अधिकारों के समर्थन में जगह-जगह उन्होंने अपने व्याख्यान दिये। 2018 में हुए ‘मी टू आंदोलन’ (Me Too Movement) के समर्थन में भी उन्होंने कहा था: “ये समय की बात है। अब तक महिलाएँ यह सोच कर चुप थीं कि इसके विषय में कुछ नहीं किया जा सकता है, पर अब जब कि कानून उन महिलाओं और पुरुषों, जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव किया है, के साथ खड़ा है तो, यह बहुत अच्छी बात है”।
अपनी निजी ज़िंदगी में भी रूथ की सफलता ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया आयाम खोला था। मार्टिन डी॰ गिन्स्बर्ग, (कॉर्नेल विश्वविद्यालय में रूथ के सीनियर) से स्नातक खत्म होने के साथ ही रूथ ने प्रेमविवाह किया था, और यह साथ, 2010 में विवाह की 56वीं सालगिरह मनाने के चार दिन बाद, मार्टिन के देहांत के साथ खत्म हुआ। एक ही पेशे में रहते हुए भी, दोनों ही ने एक दूसरे की प्रगति को ज़िंदगी का ध्येय माना और जिम्मेदारियों का निर्वहन भी समान स्तर पर किया।
पुरुष की कामयाबी के पीछे महिलाओं की भूमिका को तो सभी स्वीकार करते हैं, पर एक महिला की कामयाबी के पीछे एक पुरुष का भी योगदान रह सकता है, एक बड़ी बात है, खासकर के एक ऐसे समय और समाज में जहां लैंगिक भूमिकाएँ (Gender Roles) भी एक पारंपरिक खांचे में डाल दिये जाते हैं। रूथ और मार्टिन इस दृष्टि से एक अतुलनीय पति-पत्नी थे। मार्टिन न केवल एक पति के रूप में बल्कि एक सहकर्मी के रूप में भी रूथ की क़ानूनी बुद्धिमत्ता के प्रशंसक थे। मरने से पहले मार्टिन ने रूथ के नाम जो संदेश लिखा था वह इस जोड़ी के अनोखे प्रेम और विश्वास को दिखलाता है: “रूथ, अगर अपने माता-पिता, बच्चों और उनके बच्चों को थोड़ा अलग कर के देखूँ, तो बस तुमसे ही मैंने ताउम्र प्रेम किया है। मैंने तब से तुम्हें चाहा है और तुम्हारा प्रशंसक रहा हूँ, जब हम कोई 56 साल पहले कॉर्नेल में मिले थे”।
रूथ ने अपनी ज़िंदगी के बारे में, अपनी आत्मकथा, माइ ओन वर्ड्स (My Own Words) में लिखा है। उनकी ज़िंदगी पर सिनेमा और डॉक्युमेंट्री तक बन चुके हैं। उनकी असहमति से भरे निर्णयों ने उन्हें अमेरिकी कानून व्यवस्था में एक तरह से कुख्यात कर दिया था, और वो नोटोरियस आर॰बी॰जी॰ (Notorious RBG) के रूप में मशहूर थीं। युवा वर्ग में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी छवि से प्रेरित होकर के तरह-तरह के कार्टून, सामान इत्यादि बना करते थे। और देखा जाये तो वास्तव में महज़ 5 फुट और 1 इंच की छोटी-सी काया वाली, जस्टिस रूथ बेदर गिन्स्बर्ग की कहानी किसी सुपरहीरो से कम नहीं थी। उनके काम ने लाखों महिलाओं के लिए न केवल प्रेरणा का कार्य किया, बल्कि संभावनाओं और अवसरों के अनगिनत द्वार खोल दिये, जो केवल लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं के लिए बंद थे।

पर सवाल यह उठता है कि जब हमारे अपने देश में भी ऐसे सुपरहीरोज़ की कमी नहीं है, तब क्या वजह है कि वो हमारी सामूहिक स्मृतियों का हिस्सा नहीं हैं? देखा जाये तो हमारे देश में भी महिलाओं की सफलता के किस्से कम नहीं हैं, पर फ़र्क इतना है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था, ऐसी ज़िंदगियों और उनके किस्सों को इतना प्रचारित नहीं कर पायी है। हमारे यहाँ भी महिला न्यायाधीशों ने कुछ बड़े काम किए हैं, जस्टिस लीला सेठ इस दृष्टि से अतुलनीय रहीं हैं (हिमाचल प्रदेश की मुख्य न्यायाधीश, जिनकी जीवनी ऑन बैलेन्स, 2003 में आई)। पर अक्सर कानून की दुनियाँ को हम पुरुष न्यायाधीशों या वकीलों की आँखों से देख पाते हैं, क्योंकि बहुत कम महिलाओं ने अपनी ज़िंदगी और उसके संघर्षों को लिखा है।

पर आज के संदर्भों में बिना किसी ऐसे लेखन के हम यह कल्पना कैसे कर सकते हैं कि महिलाओं के संघर्ष और सफलता की गाथा से न केवल सामाजिक स्तर पर एक मिसाल क़ायम किया जा सकेगा बल्कि युवा पीढ़ी भी उन जैसी सफलता हासिल करने का स्वप्न देख पाएगी।
बहरहाल, समय रूथ बेदर की ज़िंदगी को एक जश्न के रूप में मनाने का है और सुपरहीरोज़ की कहानी कहने का ज़िम्मा तो हम लेखक उठा ही सकते हैं, आज भी और आने वाले समय में भी।
This was also published at The Wire Hindi.






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