पगडंडियाँ

खुली सड़क के ठीक किनारे-सी लगी ,

घास-मिट्टी से ढकी, चलती जाती

सफर की निरंतरता का आश्वासन देतीं  

कभी समानान्तर तो कभी दिशाहीन-सी ये पगडंडियाँ।

सड़कें जिनका पिघलता है कोलतार सूरज की आंच में  

जिन पर जमी होती है भीड़ और

होता है जहां दिन-रात कोलाहल, उनसे

बचने की राह दिखलाती है ये पगडंडियाँ।

माना कि चलना है मुश्किल होकर इनसे,

चुभ सकते हैं कांटे और लग सकती है धूल

पर बावजूद इन सबके अनजान रास्तों की भीड़ से

राहत पहुंचाती हैं ये वीरान पगडंडियाँ।

सड़कें जिनसे होकर पहुँचना होता है जिन्हें अपने घर

और निभाने होते हैं कई रूप और

सड़कें जिन पर चलते वक़्त ,

जमी होती हैं आप पर तमाम आँखें,

इन सबसे बच-बचाकर पहुंचाती हैं

अपने ठिकाने पर ये अचल पगडंडियाँ।

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Dear Readers

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं”

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