एक अलसाई हुई दोपहरी में ,
शांत आँगन से अचानक आई कोई आवाज़।
दबे पाँव जाकर देखा तो पाया कि
खाली पड़ी कुर्सियों में बैठे हुए हैं कई शब्द,
कुछ आगे की ज़मीन पर लुढ़के हुए से शब्द।
कई प्रकार के शब्द।
कोई लच्छेदार बनावट वाला शब्द तो
कोई घुमावदार उच्चारण वाला।
कुछ लंबे शब्द तो कुछ छोटे शब्द।
तमाम रंगों वाले शब्द , तमाम भाषाओं के शब्द।
पास के पेड़ से लटकते केवल हाँ, ना वाले शब्द।
भौचंक्क होकर वहीं छिप कर सुनने लगी ये अनोखी बात
अरे यह क्या, यह तो हो रही है कोई शोक सभा।
जहां चुपके चुपके रो रहे थे कई शब्द
और कईयों ने पहने रखे थे सफ़ेद रंग
और बिखरे थे कईयों के ध्वनि और वर्ण।
थोड़ा कान लगा कर सुनना चाहा तो
जाना कि दरअसल थे बेचैन ये शब्द -भयभीत, दुखी और निःशब्द।
था कोई इनका मुखिया, वह बड़ा सा लिखनेवाला शब्द
जो कह रहा था ऊंची आवाज़ में,
कि हाँ साथियों सच ही है यह दुख की बात
कि खत्म होती जा रही है हमारी ज़ात।
लुप्त हो रहे हैं हमारी बिरादरी के शब्द
क्योंकि करता नहीं कोई अब इनका प्रयोग।
मिट चली है हस्ती हमारी कि लोगों को हम लगते हैं भारी।
इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समय में
हम हो गए हैं पुरानी कोई बीमारी।
और इसलिए भावों को महसूस करने के लिए नहीं रही जरूरत हमारी,
क्योंकि बस संकेतों में ही होती हैं बातें सारी।
हाँ इनके लिए जरूर गढ़ लिए गए हैं नए नए शब्द,
वो क्या कहते हैं उन्हे, हाँ- इमोजी और इमोटिकोंस।
वो क्या है न कि समय की कमी है अब हर किसी पे भारी
या शायद मंहगाई की ही पड़ी है मार।
तभी तो मुंह की जेब और हाथों के बटुए से,
शब्द नहीं खर्चते अब लोग।
तभी ठीक कोने में देर से
सबकी बात सुनती अँग्रेजी ने कहा कि
अरे सितम तो गज़ब हुआ है मेरे शब्दों के साथ।
इनकी तो कर दी गयी है सरे आम हत्या या
कर दिया है इनका शॉर्टकट या कह लो कनकटा।
वरना बताओ भला कोई क्यूँ बना दे ऐसे रूप
और अंत में लिख दे केवल LOL या K
और फिर सभा खत्म करते एक बूढ़े शब्द ने हँसते हुए कहा,
अरे मेरे बच्चों न हो इतना उदास
क्योंकि है तो दरअसल ये हंसी की ही बात।
आदम युग से जिस भाषा का इन्सानों ने किया था ईज़ाद,
अगर खत्म कर देंगे उसे ही तो बन जाएंगे वनमानुष फिर
और संकेतों में ही करते रह जाएंगे अपने मन की बात।
और, यूं भारी मन से खत्म हुई ये शोक-सभा
और गायब होने लगे खुद-ब-खुद शब्द सभी।
वापस कदमों से चलकर फिर आई अपने पास तो देखा ,
मोबाइल पर चमक रहा था कोई संदेश नया।
भेज दिये थे किसी वनमानुष ने फिर से इमोटिकोंस
और फिर से शब्दों के बदले,
चिपका दिये थे ईमोजी बेशुमार।






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