एक दिन, हाँ ,शायद, था वह इतवार,

जब खोला था हाथों ने अधखुली आँखों से अख़बार,

और पाया था खुद को ख़बरों से बेबस और लाचार ।

खबर थी कि काट दिये गए थे कहीं घने जंगल तो ,

कहीं शुरू हो गयी थी बेतहाशा ‘बुशफ़ायर’।

पिघलने लगीं थीं बर्फ की चादरें कहीं तो,

कहीं आने वाला था जल का पारावार।

एक तरफ विलुप्त हो रहे थे निरीह प्राणी अगर तो,

अचानक ही कहीं बढ़ गया था मनुष्यों का अत्याचार।  

और इन सबके बीच कहीं , कराहती हुई प्रकृति

लगा रही थी एक ही गुहार बार-बार , कि बस बहुत हुआ

ऐ मनुष्य, थाम लो अपनी रफ्तार ।

घबरा कर दूर कहीं सरका दिया था उस दिन अख़बार,

चाहा था कर लूँ बंद अपने नाक, कान और आँख।

ताकि न भर पाऊँ साँसों में विषैली होती ये हवा ,

ताकि न सुन पाऊँ प्रकृति की ये गूँजती कराह,

और न देख पाऊँ हर दिन तीखी होती सूरज की आंच,

और सच ही तो सरका दिया था उस दिन प्रकृति को भी अख़बार के साथ।

पर यह क्या, एक नया दिन , और देखो,

फिर आ गया है निश्चित ही इतवार।

और खबरें सुनातीं हैं कि मर रहें हैं धरती के लोग,

और दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है तादाद।

खबर है कि बंद कर दिया है सरकारों ने सारा व्यापार,

नहीं चलती है सड़क पर धूल और

आसमान में धुआँ उड़ाती वो गाड़ियां वो जहाज़।

नहीं निकलते हैं लोग झुंड-के-झुंड करने प्रकृति का अब शिकार,  

सुना है, सब है सहमे और भयभीत !

कहते हैं , प्रकृति ने भेजा है बना कर एक नन्हें जीव को अपना हथियार !

अब सुनाई देती है हर ओर बस लोगों की कराह।

पर इन्हीं खबरों के बीच यकायक

खुल कर आ रही है अब प्रकृति की आवाज़।

मानो कह रही हो कि ‘ऐ मनुष्य कहा था न कर ले धीमी अपनी रफ्तार,

वरना उठा नहीं पाऊँगी तुम सब का बढ़ता भार।‘

सहमे नज़रों से फिर दूर कर दिया है अख़बार,

पर मन में रह-रह कर आता है एक ही विचार।

प्रकृति तुम्हें अनदेखा और अनसुना करने का

दंड भुगत रहा है मनुष्य और उसका प्यारा संसार,

और खुद ही थम गयी जाने कैसे उसकी वो रफ़्तार !

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