
कम ही होता है जब होते हैं अपने साथ,
कुछ कोहरे, कुछ चीड़ और खामोश पहाड़ों का साथ,
एक लंबी खामोशी और हवाओं का भी शोर नहीं।
कम ही होता है , जब झाँकती है सिंदूरी धूप ठीक पहाड़ों के पीछे से,
और आती है दूर कहीं किसी पहाड़ी नदी की छल-कल की आवाज़
पर सब कुछ बस चुपचाप।
जाने क्या करती हैं बातें चीड़ की पत्तियाँ स्वयं के साथ
या कहीं पहाड़ों से ही तो नहीं कर रहीं बात ?
खामोश सूनी सड़कों पर रह-रह कर गुज़र जाते हैं,
कुछ लोग , कुछ मोटरें और कुछ कुत्ते ।
पर सब कुछ मानो खामोशी के इस कैनवस पर जड़ा हुआ-सा,
एकदम ही तो चुपचाप ।
देखो न कितना सुंदर है सामने वह आकाश
शाम के इस धुंधलके में जो हो चला है कुछ लाल।
काली घाटियों में छन- छन कर गिरता सफ़ेद कोहरा ,
और यह क्या, अचानक ही पास के बादलों पर,
नीली बिजलियों ने भी डाल दिया है अपना पहरा,
दबे कदमों से एकदम ही चुपचाप।
देखो न कैसे , निःशब्द इस घाटी में दूर तक गूंज जाती है
पन्नों पर गिरते मेरे शब्दों की आवाज़।






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