चुपचाप रहा करती है वो, सब कुछ सहा करती है वो,

तुम्हारी शांति बनी रहे,

दिन-रात घुला करती है वो,

जो खोल दे अपने होंठ सिले,

और फूट पड़े लावा पिघले,

तुम हिंसक पशु बन जाते हो,

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

धरती पर कदम रखा जब से, तय किए गए सब काम उसके,

और दिये गए सब नाम उसके,

हो बेटी, बहन, बहू और माँ ,

पर भुला दिया गया उस ‘स्त्री” को,

हर काम की अपनी सख्ती थी,

हर नाम की अपनी नियति थी,

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

तुमने ही तो बनाए नियम कानून ,

ये संकृति, परंपरा, मर्यादा और इज्जत,

शर्म, हया, तहज़ीब और नफासत,

हर शब्द का मतलब स्त्री है,

हर लफ्ज का मतलब बस औरत है,

क्या खूब ये तुमने खेल रचा ,

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

उसको भी बनाया प्रकृति ने,

और ठीक उसी क्षण जब तुम्हें बनाया था,

पर जाने कब और क्यूँ कर

तुम उसके निर्माता बन बैठे और गढ़ने का अहम भी पाल लिया

और जकड़ने का जतन भी ठान लिया,

पर समझ लो , यह खेल तुम्हारा, उसने भी पहचान लिया।

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

पर बहुत हुआ, अब दौर बदले,

सदियों रही तुम्हारी नज़र, अब ठौर बदले,

चुप रही ज़ुबान अब बेलगाम चले

और भले तुम्हारे कानों में शीशा पिघले,

क्यों करे भला वह अब इंतज़ार,

जब नामों-निशान भी मिट जाएगा।

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

होगी पिटती, वह वक्त रहा करता होगा,

लुटती होंगी सरे आम कई, वह दौर हुआ करता होगा,

पर अब न पिटेगी और लुटेगी वह स्त्री

जिसे द्रौपदी और सीता कहा जाता होगा,

अब सुन लिया है युद्ध का नाद उसने,

और दु:शासनों से भिड़ने की उसने स्वयं कर ली तैयारी है।

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

यह परिवर्तन क्या यकायक दौड़ता आया है?

यह साहस तो क्या उसने तुमसे पाया है?

अरे नहीं, नहीं, यह तो उसका वह “व्यक्ति” है

जो हर दिन मरने के बाद उभर कर आया है,

अब समय के पीले दस्तावेजों पर उसका ‘स्व’ भी लहराएगा।

क्योंकि न भूलेगी वह, न तुम्हें भूलने देगी अब ।

क्या समझ रखा है स्त्री को ?

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अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

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